तीर्थन घाटी में तीन दिन तक चले फागली उत्सव का हुआ समापन
देश के अलग-अलग से आए पर्यटकों ने भी लिया उत्सव का आनंद
संवाद न्यूज एजेंसी
बंजार (कुल्लू)। तीर्थन घाटी में तीन दिन तक चले फागली उत्सव का समापन हो गया। इस दौरान मुखौटा नृत्य विशेष आकर्षण का केंद्र रहा। खासकर देश के अलग-अलग से आए पर्यटकों ने इस दौरान खूब आनंद लिया।
उत्सव के दौरान अलग-अलग क्षेत्रों में परंपरागत लोक संस्कृति की झलक भी देखने को मिली। इस दौरान घाटी के पेखड़ी, नाहीं, तिंदर, काउंचा, डिंगचा, सरची, जमाला, फरयाड़ी, कलवारी, बशीर, गरुली और श्रीकोट सहित अनेक गांवों में फागली उत्सव उत्साह के साथ मनाया गया। उत्सव के दौरान विभिन्न गांवों में लकड़ी के मुखौटे पहनकर विशेष पारंपरिक वेशभूषा में नृत्य किया।
फाल्गुन संक्रांति के दिन छोटी फागली और अगले दिन बड़ी फागली हुई। तीसरे दिन देव पूजा और तवार के बाद गूर के माध्यम से नकारात्मक शक्तियों को गांव से बाहर भगाने की परंपरा निभाई गई। गांवों में कई तरह के पारंपरिक व्यंजन बनाए गए। ग्राम पंचायत नोहांडा के पूर्व प्रधान सवर्ण सिंह ठाकुर और स्थानीय लोगों ने कहा कि तीर्थन घाटी में प्राकृतिक सौंदर्य के साथ प्राचीन संस्कृति का अमूल्य खजाना मौजूद है। इसे सहेजने और संवारने की आवश्यकता है। उधर, महाराष्ट्र, पंजाब, कर्नाटक, तमिलनाडु, दिल्ली और आंध्र प्रदेश से आए पर्यटकों ने भी इस उत्सव का खूब आनंद लिया। कई पर्यटक मुखौटा नृत्य और लोकनृत्यों को अपने कैमरों में कैद करते नजर आए।
मंडी स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के संस्कृति विभाग में कार्यरत प्रोफेसर सूर्य प्रकाश का कहना है कि वह युवा पीढ़ी को भी प्रोत्साहित करेंगे कि वे हिमाचल प्रदेश के अंदरुनी क्षेत्रों तक जाएं और केवल मैक्लोडगंज और धर्मशाला तक ही सीमित न रहें।