बंजार के तिंदर गांव में फागली उत्सव के दौरान मुखौटे पहनकर नृत्य करते ग्रामीण ।-जागरूक पाठक
जनजातीय क्षेत्र लाहौल के प्यूकर गांव के ग्रामीणों ने किया पूजा-पाठ
भोज पत्र पर अंकित याक के चित्र पर तीर छोड़ने की भी निभाई परंपरा
दिनेश जस्पा
उदयपुर (लाहौल-स्पीति)। जनजातीय क्षेत्र लाहौल के प्यूकर गांव के ग्रामीणों ने आज भी पुरातन संस्कृति को संजोकर रखा है। परंपरा के अनुसार ग्रामीणों ने देवी-देवताओं के देवलोक से धरती पर पधारने के लिए पूजा पाठ किया।
प्यूकर वासियों ने पारंपरिक वेशभूषा में चमकती बर्फ के बीच देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के लिए पारंपरिक परिधान पहनकर शैणी नृत्य किया। 20 घरों की आबादी वाले प्यूकर गांव में पुरातन संस्कृति का निर्वहन किया गया। दवा छेरिंग के दावे के अनुसार उनके बुजुर्ग बताते थे कि सदियों में पहले गोची उत्सव में पूजा-पाठ का समय रहता था।
गौर रहे कि प्यूकर गांव लाहौल घाटी का एक ऐसा गांव है जहां गोची उत्सव में बेटी के जन्म पर भी पूजा-पाठ और धाम का आयोजन किया जाता है। यह त्योहार समूची गाहर घाटी में मनाया जाता है। प्यूकर गांव में पुत्र के साथ पुत्री के जन्म पर भी गोची पर्व मनाया जाता है। 2025 में गांव में दो बेटियों ने जन्म लिया है। इस कारण सोमवार को छेरिंग छरज़ीपा के घर में वीरवार को कंग्यूर के घर गोची की रौनक रही। दवा छेरिंग ने बताया कि शुक्रवार सुबह 11 बजे ग्रामीणों ने पारंपरिक परिधान में सजकर पूजा-पाठ कर देवलोक से देवी-देवताओं को धरती पर आने का निमंत्रण दिया। उसके बाद गांव के सभी लोग जिनके घर बेटी का जन्म हुआ है, वहां जश्न मनाया। रात्रि 12 बजे के आसपास भोज पत्र पर अंकित याक के चित्र पर तीर छोड़ने की पुरातन परंपरा का निर्वहन किया गया।