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Kullu News: कुल्लू में डराने लगे बढ़ते हेपेटाइटिस-बी के मामले

Thu, 15 Jan 2026 10:11 PM IST
शिमला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, कुल्लू
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जिले में साल 2024 के बजाय 2025 में मिले अधिक मरीज
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क्रॉनिक हेपेटाइटिस-बी के कारण लिवर फेलियर का खतरा
राजीव नैय्यर
कुल्लू। जिले में हेपेटाइटिस-बी के मामले डराने लगे हैं। इस वायरस की चपेट में लोग अधिक आ रहे हैं। साल 2025 में हेपेटाइटिस-बी के मरीजों की संख्या बढ़ी है। लोग लिवर संक्रमण और पीलिया की चपेट में अधिक आए हैं।
हालांकि, जिले में वर्ष 2024 में हेपेटाइटिस-बी के मामले कम रहे हैं। इस जानलेवा बीमारी के प्रति लोगों में जागरूकता कम है जो एक चिंता का विषय है। लापरवाही और समय पर जांच न होने के कारण यह वायरल लिवर फेलियर और लिवर के कैंसर का कारण बन रहा है।
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विशेषज्ञ चिकित्सकों की मानें तो लोग काला पीलिया समझ कर इसे नजर अंदाज करते हैं और जान गंवा रहे हैं। क्रॉनिक हेपेटाइटिस-बी संक्रमण से यकृत में सूजन, सिरोसिस और यकृत कैंसर जैसी गंभीर जटिलताएं हो सकती हैं। इसके अलावा दूषित पेयजल का उपयोग भी बढ़ी समस्या है। संख्या में एकाएक वृद्धि हो जाती है। हालांकि, जिले में साल 2024 में 88 मरीज चपेट में आए थे जबकि 2025 में आंकड़ा बढ़कर 126 पहुंच गया। यह आंकड़ा उन मरीजों का है जो उपचार के लिए अस्पतालों में भर्ती रहे हैं जबकि ओपीडी की संख्या सैकड़ों में है। उधर, क्षेत्रीय अस्पताल कुल्लू के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. ताराचंद ने कहा कि साल 2024 में 88 और 2025 में 126 मरीज हेपेटाइटिस-बी की चपेट में आए हैं।

हेपेटाइटिस-बी जैसी घातक और छिपी हुई बीमारी के बारे में जागरूकता बढ़ाई जा रही है। लोगों को समय पर जांच और उपचार के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। साल 2025 में विषय हेपेटाइटिस दिवस की थीम चलो इसे तोड़ें रही है। इस बीमारी को साल 2030 तक खत्म करने का लक्ष्य रखा है। -डॉ. रणजीत ठाकुर, मुख्य चिकित्सा अधिकारी कुल्लू

यह है हेपेटाइटिस-बी
हेपेटाइटिस-बी वायरस (एचबीवी) के कारण होने वाला लिवर संक्रमण है। ज्यादातर लोगों में हेपेटाइटिस-बी अल्पकालिक होता है। हालांकि, अगर ये संक्रमण छह महीने से अधिक समय तक बना रहता है तो इस क्रॉनिक हेपेटाइटिस-बी के कारण लिवर फेलियर, लिवर कैंसर और लिवर सिरोसिस जैसी समस्याओं का जोखिम बढ़ जाता है।
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हेपेटाइटिस-बी के लक्षण
इस संक्रमण के कारण थकान, पीलिया (त्वचा व आंखों का पीला होना), पेट दर्द, उल्टी, गहरे रंग का पेशाब होने की दिक्कत देखी जाती है। इस संक्रमण से बचाव के लिए टीके उपलब्ध हैं। नवजात या टीकाकरण से छूट गए बच्चों को इसकी वैक्सीन जरूर लगवानी चाहिए।
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