पर्यावरण संरक्षण- शरण बीट स्थित रिंगु वन में पेड़ों पर कुल्हाड़ी चलाना भी माना जाता है पाप
घास-पत्ती और लकड़ी लाना है वर्जित, लोगों का वन में प्रवेश भी है निषेध
देव कारज को लेकर ही वन में नंगे पांव और भूखे पेट प्रवेश करते हैं लोग
संवाद न्यूज एजेंसी
सैंज (कुल्लू)। हिमाचल की शांत वादियों में एक ऐसा वन भी है जहां न सीसीटीवी हैं और न ही गश्त करने वाले दल, फिर भी पेड़ों की एक टहनी तक बिना अनुमति नहीं टूटती।
सैंज की रैला पंचायत में आस्था ही कानून है और देव नियम ही संविधान। ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क की शरण बीट में स्थित रिंगु वन में लोग मानते हैं कि पेड़ों में देवताओं का वास है। इसलिए पेड़ों पर कुल्हाड़ी चलाना पाप माना जाता है। यही कारण है कि क्षेत्र में घने जंगल आज भी अपना वजूद बनाए हुए हैं। ऐसे में क्षेत्र में यह देव मान्यता पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में भी अहम भूमिका निभा रही है।
जिले की ग्राम पंचायत रैला-2 के अंतर्गत आने वाले विश्व धरोहर ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क की शरण बीट में देवता रिंगु नाग के नाम से जाने वाले रिंगु वन में आज भी दराट (दराती) और कुल्हाड़ी नहीं चलती। स्थानीय पंचायत के लोगों का भी इस वन में प्रवेश निषेध है। लोग सिर्फ देव कारज को लेकर ही इस वन में नंगे पांव और भूखे पेट प्रवेश करते हैं। लोगों में मान्यता है कि पेड़ों में देवी-देवता वास करते हैं। इन जंगलों से घास-पत्ती और लकड़ी लाना भी वर्जित है। यही कारण है कि नेशनल पार्क प्रबंधन को भी इन वन क्षेत्रों में किसी तरह के सूचना बोर्ड लगाने की नौबत तक नहीं आई। बाहर से आने वाले लोगों को इस मान्यता का पता चल सके, इसके लिए देवता कमेटी की ओर से यहां बोर्ड लगाया गया है। इसमें इस वन में प्रवेश निषेध है अंकित किया गया है।
ग्राम पंचायत रैला के अंतर्गत आने वाली जीवानाला रेंज की शरण बीट के रिंगुवन का देवता रिंगू नाग का वर्जित वन क्षेत्र है। यहां जाना आम व्यक्ति के लिए और लकड़ी काटना प्रतिबंधित है। - केहर सिंह ठाकुर, अध्यक्ष दी रैला एको टूरिज्म कोऑपरेटिव सोसायटी