विडंबना यह है कि दो बड़ी आपदाओं के बाद भी क्षेत्र में स्थायी सुरक्षा उपायों को लेकर अपेक्षित प्रगति नहीं हो पाई है। कई संवेदनशील स्थानों पर आज भी न तो मजबूत सुरक्षा दीवारें बनी हैं और न ही राष्ट्रीय राजमार्ग को सुरक्षित करने के लिए व्यापक कार्य किए गए। ब्यास के किनारे स्थित सोलंग, पलचान, नेहरूकुंड, मनाली, बाहंग, पतलीकूहल, रायसन और कुल्लू के कई हिस्से आज भी खतरे की जद में हैं। आपदा के दौरान नदी ने कई स्थानों पर तटों को काट दिया था। मनाली से कुल्लू तक लगभग 12 जगह कई मीटर हाईवे ब्यास में समा गया। यह अभी भी अस्थायी तौर पर ही चल रहा है।
कई होटल, दुकानें, घर और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठान भी नदी के कटाव और बाढ़ की चपेट में आए। उस समय प्रशासनिक स्तर पर भी योजनाएं तैयार करने की बात कही गई थी। आपदा को लंबा समय बीत जाने के बावजूद स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं दिखाई दे रहा।
सबसे बड़ी चिंता राष्ट्रीय राजमार्ग को लेकर है। आपदा के बाद स्थायी समाधान के लिए लगभग 400 करोड़ रुपये की परियोजना मंजूर होने की बात कही गई थी, लेकिन नौ महीने बीतने के बाद भी काम शुरू नहीं हुआ। इस परियोजना के तहत ब्यास नदी के किनारे तट संरक्षण, सुरक्षा दीवारों का निर्माण और राष्ट्रीय राजमार्ग को सुरक्षित करने के लिए विभिन्न स्थायी उपाय किए जाने थे। एनएचएआई के परियोजना अधिकारी वरुण चारी ने कहा कि एनएच का स्थायी हल जल्द होगा। इसके लिए टेंडर हो गए हैं। जल्द कार्य शुरू किया जाएगा।