अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा का व्यापारिक स्वरूप आधुनिकता के दौर में तेजी से बदल रहा है। कभी तिब्बत के साथ व्यापार के लिए प्रसिद्ध रहे इस उत्सव में आज करोड़ों रुपये का कारोबार होता है। कपड़ों और खान-पान की वस्तुओं से लेकर हथकरघा उत्पादों तक की बिक्री मेले की आर्थिक गतिविधियों को नई पहचान दे रही है। खास बात यह है कि बदलते व्यापारिक स्वरूप के बीच दशहरा की सदियों पुरानी देव परंपराएं आज भी उसी निष्ठा, विधि-विधान और आस्था के साथ निभाई जा रही हैं।
सिड्डू से हथकरघा उत्पादों तक की मांग
कुल्लू दशहरा में स्थानीय व्यंजनों और पारंपरिक उत्पादों का कारोबार लगातार आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। कुल्लू के मशहूर सिड्डू की बिक्री बड़े स्तर पर होती है। स्थानीय महिलाएं और स्वयं सहायता समूह पारंपरिक पकवान तैयार कर बेच रहे हैं, जिससे स्थानीय उत्पादों को बाजार मिल रहा है।
वहीं, हथकरघा से बनी वस्तुएं विदेशी पर्यटकों और दूसरे राज्यों से आने वाले सैलानियों को आकर्षित कर रही हैं। इसके अलावा गर्म कपड़ों, बर्तनों, क्रॉकरी और जूतों की भी अच्छी बिक्री होती है। समय के साथ मेले में नए उत्पादों और व्यापारिक गतिविधियों का विस्तार हुआ है, जिससे इसका आर्थिक महत्व भी बढ़ा है।
कारोबार के बीच कायम हैं देव परंपराएं
व्यापारिक बदलावों के बावजूद कुल्लू दशहरा की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान आज भी बरकरार है। सैकड़ों देवी-देवता ढालपुर स्थित अठारह करड़ू की सौह में भगवान रघुनाथ के दरबार में हाजिरी भरते हैं। यह परंपरा उत्सव को विशिष्ट धार्मिक महत्व प्रदान करती है।
इतिहास के अनुसार, 17वीं सदी में राजा जगत सिंह ने भगवान रघुनाथ को कुल्लू रियासत का प्रमुख आराध्य घोषित किया था। इसके बाद भगवान रघुनाथ की सेवा और छड़ीबरदार से जुड़ी परंपराएं शुरू हुईं, जिनका निर्वहन आज भी किया जा रहा है।
सात दिनों तक राजपरिवार के सदस्य पारंपरिक वेशभूषा में भगवान रघुनाथ के दरबार में उपस्थित रहते हैं। पूर्व सांसद महेश्वर सिंह छड़ीबरदार के रूप में भगवान रघुनाथ के समक्ष मौजूद रहते हैं। इससे उत्सव में ऐतिहासिक परंपराओं और धार्मिक आस्था की निरंतरता देखने को मिलती है।