मकान क्षतिग्रस्त होने से पड़ोसियों के घर में शरण लेकर रह रहे पिगरंग गांव के कई परिवार
बोले- राहत के नाम पर सरकार से तिरपाल ही मिले, पूरे गांव की हिल गई है नींव
प्रभावित बोले- गांव के अगले भाग से हो रहा भूस्खलन और पीछे से दरक रही है पहाड़ी
गौरीशंकर
कुल्लू। आपदा सिर्फ जमीन नहीं खिसकाती, भरोसे भी गिरा देती है। कुल्लू की पारली पंचायत के पिगरंग गांव में लोगों के घर नहीं बचे हैं। नौ परिवार पूरी तरह बेघर हैं। 27 घरों पर संकट मंडरा रहा है।
पहाड़ के एक ओर पत्थर दरक रहे हैं, दूसरी ओर उम्मीदें। सरकार ने राहत के नाम पर अब तक सिर्फ तिरपाल दिया है। जिनकी जिंदगी खुले आसमान के नीचे आ गई हो, उनके लिए तिरपाल कोई समाधान नहीं। आपदा से गड़सा घाटी के पिगरंग गांव की नीव पूरी तरह से हिल गई है। प्रभावित उन घरों में शरण लेकर रह रहे हैं जो सुरक्षित बचे हैं। उनका कहना है कि गांव के अगले भाग से लगातार भूस्खलन हो रहा है। पीछे भी पहाड़ी दरक रही है।
कौल सिंह, प्रकाश चंद, भीमी राम, ओम प्रकाश, मेहर सिंह, घनश्याम, मुरलीधर और लीलाधर के मकान असुरक्षित हो चुके हैं। लीलाधर ने कहा कि पिगरंग गांव पारली पंचायत के आइशा वार्ड में आता है। जिनके मकान क्षतिग्रस्त हुए हैं, उनके पास रहने के लिए कुछ नहीं बचा है।
... कब तक रहेंगे पड़ोसियों के घर
लीलाधर, प्रकाश चंद, कौल सिंह के साथ अन्य प्रभावितों ने कहा कि वे पड़ोसियों के घर में रह रहे हैं। अपने टूटे हुए मकान में नहीं लौट पाएंगे। ज्यादा समय पड़ोसियों के घर भी नहीं रह सकते। ऐसे में हमारे सामने इस बात की चुनौती है कि वह परिवार के साथ कहां जाएं।
... तिरपाल के सिवाय कुछ नहीं मिला
प्रभावितों ने कहा कि प्रशासन और सरकार की मदद की बात की जाए तो अभी तक तिरपाल के सिवाय कोई सहायता नहीं मिली है। गांव के लोगों को ठेला से चार किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई चढ़कर पीठ पर राशन लाना पड़ रहा है। पहले ही लोग आपदा के सताए हुए हैं, ऊपर से दो वक्त की रोटी के लिए भी चढ़ाई पार करनी पड़ रही है।
... घर बनाने के लिए जमीन तक नहीं बची
प्रभावित लोगों ने प्रशासन और सरकार से गुहार लगाई है कि घर छोड़ने वाले लोगों के लिए रहने के साथ मकान बनाने का प्रावधान किया जाए। तीन प्रभावितों के पास न घर बचा है और न ही जमीन। घर बनाना भी चाहें तो दो बिस्वा भूमि तक नहीं है।