विशेषज्ञों ने बताया आधुनिक और वैज्ञानिक तरीके से कीट प्रबंधन
बागवानों को दी जड़ छेदक कीट पर जैविक नियंत्रण संबंधी सीख
फलोत्पादक मंडल भवन माहिली में बागवानों को दिया प्रशिक्षण
संवाद न्यूज एजेंसी
पतलीकूहल/नग्गर (कुल्लू)। फलोत्पादक मंडल भवन माहिली में हुए शिविर में जैविक खेती और सेब के बगीचों में बढ़ रहे जड़ छेदक कीट नियंत्रण पर चर्चा हुई। बागवानी विभाग के विशेषज्ञों ने आधुनिक तकनीकों के साथ वैज्ञानिक तरीके से कीट प्रबंधन की जानकारी दी। बागवानों को रसायनों के स्थान पर जैविक विकल्प अपनाने की सलाह दी।
शिविर में एसएमएस बायो कंट्रोल लेबोरेटरी शिमला के डॉ. विरेंद्र वर्मा ने सेब की जड़ों को नुकसान पहुंचाने वाले कीट डोरिस्थिनिस ह्युजैलाई के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि यह कीट 2.5 से तीन वर्ष तक जड़ों को भीतर से खाकर पेड़ों को खोखला कर देता है। इससे उत्पादन में भारी गिरावट आती है। इसके जैविक नियंत्रण के लिए उन्होंने मैटाराईजियम एनाइसोपली (ग्रीन मसकारडाइन फंगस) के प्रयोग की विधि समझाई। उन्होंने कहा कि 30 ग्राम फंगस पाउडर को 1.5 किलोग्राम गोबर की खाद में मिलाकर जुलाई-अगस्त में पेड़ों के तौलिये में डालना प्रभावी उपाय है। मानसून के दौरान लाइट ट्रैप लगाने से वयस्क कीटों की संख्या कम की जा सकती है। उधर, फलोत्पादक मंडल के अध्यक्ष प्रेम शर्मा ने कहा कि घाटी के बागवान जैविक खेती की ओर बढ़ना चाहते हैं लेकिन इसके लिए सरकार को मजबूत बुनियादी ढांचा तैयार करना होगा।
बागवानों को वर्षभर की स्प्रे डायरी तैयार करनी चाहिए। यदि बागवान पिछले वर्षों के स्प्रे, मौसम और उत्पादन का रिकॉर्ड रखेंगे तो वे वैज्ञानिक आधार पर निर्णय ले सकेंगे और अनावश्यक खर्च से बचेंगे। जैविक खेती भविष्य की जरूरत है। इसे चरणबद्ध तरीके से अपनाए। -डॉ. राजकुमार, उपनिदेशक बागवानी विभाग