कहीं 17 बच्चों के लिए एक तो कहीं एक-एक बच्चे को एक-एक अध्यापक पढ़ा रहा है। ऐसे में कुछ प्राथमिक स्कूल तो बंद हो गए हैं और कुछ पर ताला जड़ने की नौबत आ चुकी है।
शिक्षा विभाग ने लाहौल घाटी के छह स्कूलों को बंद कर दिया है। जिसमें एक भी बच्चे ने दाखिला नहीं लिया है। करीब 33 हजार आबादी वाले जिले की लाहौल घाटी में वो दिन दूर नहीं जब सरकारी प्राथमिक पाठशालाएं इतिहास हो जाएंगी।
आप विश्वास करें या न करें लाहौल घाटी में ऐसे भी सरकारी स्कूल हैं। अध्यापकों के होते हुए भी कई स्कूल डेपुटेशन के अध्यापकों के सहारे चलाए जा रहे हैं। वहीं, सरकारी स्कूलों में पिछले एक दशक से लाहौल के लोगों को अपने नौनिहालों को जिला के बाहर के स्कूलों में पढ़ाने का क्रेज बढ़ा है।
हैरानी की बात यह है कि इन प्राथमिक पाठशालाओं में तैनात अध्यापकों के अपने बच्चे ही जिला से बाहर के स्कूलों में अध्यनरत हैं। लाहौल में 141 प्राथमिक स्कूलों में से अब 135 स्कूल रह गए हैं। विषम भौगोलिक परिस्थितियों वाले इस शीत मरुस्थल से ज्यादातर लोगों का अपने नौनिहालों को जिला से बाहर के स्कूलों में पढ़ाने का क्रेज बढ़ गया है। या फिर उनकी मजबूरी हो गई है।
दिलचस्प है कि पूरी लाहौल घाटी में 135 प्राथमिक स्कूलों में लगभग 95 फीसदी स्कूलों के औसतन छह से सात के करीब बच्चे अध्ययनरत हैं। शिक्षा विभाग की फाइलों पर नजर दौड़ाएं तो उदयपुर ब्लॉक के तहत केंद्र प्राथमिक स्कूल सलग्रां में 17 बच्चों को एक अध्यापक पढ़ा रहा है।
तो वहीं मेह, क्वारिंग, दालंग, तिनो, दारचादंगमो, थोरंग, प्यासो, चेवर सहित कई प्राथमिक स्कूलों में एक-एक बच्चे को एक-एक अध्यापक ही पढ़ा रहे हैं। लाहौल घाटी के सरकारी स्कूलों की स्थिति यही रही तो आने वाले दिनों में लाहौल में प्राथमिक स्कूलों का नाम ही शेष रह जाएगा।
वर्ष 2002 में तेलिंग, 2003 छिका, 2004 में छेलिंग, 2005 में लोमंच, 2015 में चैवंक और लिंडूर स्कूल को भी बंद कर दिया गया है। शिक्षा उपनिदेशक लाहौल प्रेमनाथ परशीरा का कहना है कि घाटी में शिक्षा के गुणात्मक सुधार तो बेहतर है, लेकिन लाहौल के लोगों का अपने नौनिहालों को घाटी से बाहर के निजी स्कूलों में पढ़ाने का क्रेज बढ़ गया है।