देवी-देवताओं के अस्थायी शिविरों में सुबह और शाम को हो रही विशेष पूजा-अर्चना
ढोल-नगाड़ों और शहनाई की ध्वनियों से गुंजायमान हो रहा दशहरा का माहौल
गौरीशंकर
कुल्लू। अंतरराष्ट्रीय दशहरा उत्सव के दूसरे दिन की शुरुआत देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना से हुई। सुबह पांच बजे ढालपुर मैदान में विराजमान देवी-देवताओं के कारकूनों ने पूजा-अर्चना की प्रक्रिया शुरू की।
अलग-अलग टेंटों में अलग-अलग समय में पूजा का दौर चला। यह दोपहर तक जारी रहा। सुबह से ढोल-नगाड़ों, शहनाई और शंख ध्वनियों से माहौल गुंजायमान रहा। देव ध्वनियों के साथ मंत्रोच्चारण कर पूजा शुरू हुई। दोपहर होते ही देवी-देवता अपने अस्थायी शिविर से हारियानों के कंधों पर सवार होकर भगवान रघुनाथ के अस्थायी शिविर में बारी-बारी पहुंचे। देवी-देवताओं के साथ ढालपुर पहुंचे कारकूनों का कहना है कि मंदिर की तर्ज पर अस्थायी शिविरों में भी नियमित पूजा-अर्चना हो रही है। देव वाद्य यंत्रों की ध्वनि पर देव और मानव मिलन भी आकर्षण का केंद्र बन रहा है।
हार शृंगार के बाद लगाया भगवान रघुनाथ को भोग
भगवान रघुनाथ के अस्थायी शिविर में भी सुबह पूजा-अर्चना की गई। इसके बाद पाठ शुरू हुआ। इस दौरान महिलाओं ने भजन-कीर्तन किया। भगवान रघुनाथ का स्नान करवाया गया और हार शृंगार के बाद भोग लगाया गया। इस देव कारज के सैकड़ों श्रद्धालु गवाह बने। गौरतलब है कि भगवान रघुनाथ की पूजा दिन में चार बार होती है।
शिविरों में चलता रहा मिलन का सिलसिला
देवी-देवताओं के शिविरों में सुबह 11 बजे के बाद दिनभर देव मिलन का सिलसिला चलता रहा। लोग अपने देवी-देवताओं को एक-दूसरे देवताओं के शिविरों में ले जाकर देव मिलन करवाते रहे और इसी बहाने मानव मिलन भी हुआ। देव वाद्य यंत्रों की ध्वनि पर देव और मानव मिलन का दृश्य देखने लायक था।
क्या कहते हैं देव समाज के लोग
बासुकी नाग रैला के गूर कर्ण सिंह ने कहा कि जिस तरह मंदिर में सुबह-शाम दो समय पूजा होती है, उसी तर्ज पर ढालपुर के दौरान भी नियमित पूजा होती है। सात दिनों में यह क्रम चलता है। पुंडरीक ऋषि के पुजारी नूरम ने कहा कि उत्सव के दौरान उनके देवता की सुबह आठ बजे और शाम को भी पूजा होती है। उत्सव के दौरान भी यह क्रम दोहराया जाता है।