कुल्लू दशहरा उत्सव के समापन अवसर पर लंका दहन के लिए निकली भगवान रघुनाथ की यात्रा।-संवाद
कुल्लू। अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव के अंतिम दिन मंगलवार को देवी-देवताओं ने आपस में मिलन कर एक-दूसरे से विदाई ली तो अपने आराध्यों को विदा करते समय श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गईं।
सात दिन तक देवधुनों, जयकारों और देव मिलन से गुलजार रहा ढालपुर भावुक विदाई का साक्षी बना। लंका दहन की परंपरा पूरी होते ही देवी-देवताओं ने अपने-अपने देवालयों की राह पकड़ ली। आराध्यों के लौटने के साथ ही अठारह करडू की सौह सूनी पड़ गई। जिन देवी-देवताओं के दर्शन और देव मिलन के लिए लोग सालभर इंतजार करते हैं, उनसे बिछड़ने की घड़ी भावुक कर गई। ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की धुनों के बीच हुए देव मिलन के बाद विदाई का सिलसिला शुरू हुआ। देवी-देवताओं के लौटते ही उनके साथ आए देवलू भी अपने गांवों और घरों की ओर रवाना हो गए। कुछ दिन पहले तक जहां हर ओर देव आस्था, भक्ति और उत्साह का माहौल था, वहीं अब मैदान में उनकी यादें ही शेष रह गई हैं।
अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा केवल देवी-देवताओं के मिलन का उत्सव नहीं, बल्कि लोगों के आपसी मेल-मिलाप और रिश्तों को मजबूत करने का भी अवसर है। इस दौरान दूरदराज के गांवों से आए लोग अपने आराध्यों के दर्शन करने के साथ परिचितों और रिश्तेदारों से भी मिलते हैं। अब देवताओं और देवलुओं की यह रौनक अगले साल फिर लौटेगी। तब ढालपुर एक बार फिर देवधुनों, जयकारों और आस्था के रंगों से सराबोर होगा और श्रद्धालुओं को अपने आराध्यों के दर्शन का अवसर मिलेगा।
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