गुशैणी (कुल्लू)। जलवायु परिवर्तन, पहाड़ों की कटाई और अवैज्ञानिक विकास ने घाटियों की नाजुकता बढ़ा दी है। कुल्लू में पिछले कई वर्षों से प्राकृतिक आपदाएं जैसे बाढ़, भूस्खलन और बादल फटने की घटनाएं लगातार हो रही हैं। प्राकृतिक आपदाओं पर शोध करने वाले विशेषज्ञों के अनुसार, पहाड़ और नदियां बार-बार चेतावनी दे रही हैं, लेकिन इंसान अब भी इन संकेतों को नजरअंदाज कर रहा है। ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क के उपरला बासु में साफ मौसम के दौरान जंगल का एक बड़ा हिस्सा अचानक खिसक गया था, जिससे दर्जनों पेड़ भूस्खलन की चपेट में आ गए थे। विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह का घटना को प्रकृति की ओर से गंभीर चेतावनी के रूप में देखा जा सकता है।
पारिस्थितिकी विशेषज्ञ डॉ. इरिना दास सरकार (पीएचडी) ने कहा कि ऐसे संकेतों को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। उन्होंने बताया कि अब पहले की तुलना में बर्फ कम पड़ रही है और ग्लेशियर पीछे जा रहे हैं। ऊपरी घाटियों में बड़ी झीलें बन रही हैं, जिससे अचानक बाढ़ का खतरा और बढ़ गया है।
डॉ. दास ने गुशैणी में भी शोध किया और पहाड़ों की पारिस्थितिकी, भू-भाग, मौसम और लोगों के जीवन के बीच गहरे संबंधों का अध्ययन किया। उनका कहना है कि हिमालय बहुत कोमल और युवा पहाड़ हैं, जहां अत्यधिक कटाई-छंटाई सहन नहीं की जाती। उन्होंने सुझाव दिया कि सदियों पुराने स्थानीय ज्ञान को आधुनिक विज्ञान के साथ जोड़कर विकास और संरक्षण की दिशा में कदम बढ़ाने की आवश्यकता है। संवाद