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सेब की अर्ली स्पर वैरायटी बनी पसंद

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पतलीकूहल (कुल्लू)। जिले में बागवानों का रुझान अब सेब की अर्ली स्पर वैरायटी की ओर बढ़ने लगा है। यह बागवानों की पंसद बन रही है। सेब की पुरानी वैरायटी छह से आठ वर्ष में फसल देना शुरू करती है। लेकिन नई स्पर किस्म से तीन वर्ष में ही सेब की फसल मिलनी आरंभ हो जाती है।
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कुल्लू में बागवान सुपरचीफ, रेड विलोक्स, रेड गाला, स्कारलेट, जेरोमाइन, वाशिंगटन स्पर वैरायटी को अधिक तरजीह दे रहे हैं। हालांकि विदेशों में भी बागवान सेब की इन्हीं किस्मों को अधिक महत्व दे रहे हैं। चीन और अमेरिका ने तो इन अर्ली वैरायटी की नई किस्मों को इजाद करने के लिए शोध भी शुरू कर दिए हैं। बागवानी के जानकारों का कहना है कि सेब की अर्ली स्पर वैरायटी तीन-चार वर्षों में ही फसल देनी शुरू कर देती है। इतना ही नहीं अर्ली स्पर वैरायटी का सेब अन्य किस्मों से पहले तैयार हो जाता है। सेब सीजन के शुरूआती दिनों में ही सब्जी मंडियों में अर्ली वैरायटी का सेब आने से बागवानों को अच्छे दाम भी मिल जाता है। स्थानीय बागवान कमल, प्रणव, कमल, धनीराम, सोहनलाल, पंछीराम, देवेंद्र सिंह, मोहन, सुभाष ने कहा कि उन्होंने कुछ वर्ष पहले प्रयोग के तौर पर सेब की अर्ली स्पर वैरायटी के पौधे बगीचों में लगाए थे। तीन वर्षों के भीतर ही इन किस्मों के बेहतरीन परिणाम सामने आने लगे। अर्ली स्पर वैरायटी के पेड़ों को एक-दूसरे से काफी हद तक कम दूरी में लगाया जा सकता है। पेड़ छोटा होने के कारण इसे बागवान छोटे बगीचे में लगा सकते हैं। उधर, इस संबंध में बागवानी विभाग के उपनिदेशक विद्या प्रकाश बैंस ने कहा कि जिले में बागवान सेब की अर्ली स्पर वैरायटी को तरजीह दे रहे हैं।
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