कुल्लू में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने वायु गुणवत्ता, ध्वनि प्रदूषण पर निगरानी को कसी कमर
दीपों के त्योहार पर सैंपल लेकर स्वास्थ्य मानकों पर की जाएगी प्रदूषण की जांच
राजीव नैय्यर
कुल्लू। दिवाली की रौनक में छिपे प्रदूषण के खतरे को अब अनदेखा नहीं किया जाएगा। कुल्लू सहित पूरे प्रदेश में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने वायु गुणवत्ता और ध्वनि प्रदूषण पर सटीक निगरानी के लिए कमर कस ली है।
दीपोत्सव से पहले और बाद में विशेष सैंपल लेकर आकलन किया जाएगा कि पटाखों की चिंगारी हवा में कितना जहर घोल रही है। पीएम10 और पीएम2.5 जैसे सूक्ष्म कणों के जरिये हवा की सेहत को मापा जाएगा।
इसके लिए प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने तैयारियां पूरी कर ली है। बोर्ड की प्रदेश के सभी जिलों में वायु गुणवत्ता और ध्वनि प्रदूषण पर नजर रहेगी। दिवाली पर वायु और ध्वनि प्रदूषण से लोगों के स्वास्थ्य पर प्रभाव न पड़े, इसके लिए बोर्ड सैंपल भी भरेगा। स्वास्थ्य मानकों के अनुसार वायु गुणवत्ता सूचकांक 100 के नीचे रहने से उसे संतोषजनक माना जाता है।
दिवाली के दिन पटाखों के धुएं और आवाज के कारण वायु और ध्वनि प्रदूषण बढ़ना आम बात है। क्या यह स्वास्थ्य मानकों के अनुसार है या नहीं, इसकी जांच प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड कर रहा है। बोर्ड सभी जिलों में दिवाली से पहले वायु की गुणवत्ता जांचने के लिए सैंपल भर चुका है। दिवाली के बाद 21 अक्तूबर को बोर्ड दोबारा सैंपल लेगा।
उधर, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी सुनील शर्मा ने कहा कि दिवाली पर वायु की गुणवत्ता और ध्वनि प्रदूषण के मामलों पर नजर रखी जाएगी। इसके लिए दिवाली से पहले और बाद में सैंपल भरकर उनकी जांच की जाएगी। वायु गुणवत्ता को पीएम10 और पीएम2.5 में जांचा जाता है।
क्या है पीएम10 और पीएम2.5
पर्टिकुलेट मैटर वातावरण में मौजूद ठोस और तरल का मिश्रण है। यह कण इतने छोटे हैं कि सांस के जरिये सीधे फेफड़ों तक पहुंचकर स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाते हैं। पीएम10 के कणों का आकार दस माइक्रो मीटर से कम व्यास का होता है। इसमें धूल, गरदा और धातु के सूक्ष्म कण शामिल होते हैं। पीएम2.4 हवा में घुलने वाला एक छोटा पदार्थ है। इसका व्यास 2.5 माइक्रो मीटर से कम होता है। पीएम2.5 का स्तर बढ़ने से धुंध छा जाती है और देखने में समस्या आती है।
ऐसे जांची जाती है वायु गुणवत्ता
वायु गुणवत्ता को एक से 100 अंकों तक संतोषजनक माना जाता है। जैसे-जैसे अंक बढ़तेे हैं, हवा की गुणवत्ता खराब होती जाती है। 100 से 200 तक ठीक-ठाक, 200 से 300 तक खराब, 300 से 400 तक बहुत खराब तथा 400 से 500 तक खतरनाक माना जाता है जो स्वास्थ्य मानकों के अनुसार घातक है।