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अर्ली वैराइटी के सेब की तरफ बढ़ा बागवानों को रूझान

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अर्ली वैरायटी सेब बना बागवानों की पहली पसंद
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जिले के बागवानों ने लगाए गेल गाला, बांस और सुपर चीफ के बगीचे
पौधरोपण से पहले बगीचे की मिट्टी की जांच से होगा फायदा
अमर उजाला ब्यूरो
पतलीकूहल (कुल्लू)। देवभूमि कुल्लू की आर्थिकी की रीढ़ मानी जाने वाली नकदी फसल सेब से उम्दा फसल लेने के लिए बागवानों का अर्ली वैरायटी के पौधों की ओर रुझान बढ़ गया है। अमेरिका, न्यजीलैंड और इटली जैसे देशों के उत्पाद को देख अब घाटी के बागवान भी कम समय और कम जगह में ज्यादा फसल पाने के लिए उक्त देशों की भांति स्पर वैरायटी यानी जल्दी फसल देने वाले सेब के पौधों में रुचि लेने लगे हैं। लिहाजा, विदेशो से मंगवाए गए स्पर वैरायटी के गेल गाला, सुपर चीफ, जेरोमाइन, स्कार्लेट-2, रेडलम गाला, पिंक लेडी, रेड कॉन और बांस जैसी अर्ली वैरायटी के सेब के पौधों को बगीचे में रोपने की ओर आकर्षित होने लगे हैं।
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बागवानी अनुसंधान केंद्र बजौरा के बागवानी वैज्ञानिक डॉ जयंत का कहना है कि स्पर वैरायटी के पौधे की कलम लगाने से दूसरे साल जबकि रूट स्टॉक लगाने से तीन से चार साल के बाद सेब का पौध फसल देना शुरू कर देता है। 15 दिसंबर के बाद लोग बगीचों में इन्हें लगाना शुरू कर देंगे। हालांकि किसी भी वैरायटी के पौधे को लगाने से पहले बगीचे की मिट्टी की जांच करवाना लाजमी है। मिट्टी में किसी तरह की कमी पाए जाने की सूरत में विशेषज्ञों से सलाह लेकर खाद डाली जाए ताकि सेब पौधों को मिलने वाले पोषक तत्वों की कमी को दूर किया जा सके। बागवान मेहर चंद, राम लाल, पिंकू, राजेश, बेली राम, प्रताप, अमर, चमन लाल तथा प्रेम सिंह ने कहा कि बागवान पुराने बगीचों की तरह स्पर वैरायटी को प्राथमिकता दे रहे हैं।
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