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तैयार भांग की खेप निकालने को माफिया ने बुलाए नेपाली

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कुल्लू। चरस के लिए बदनाम मणिकर्ण घाटी में चरस माफिया द्वारा तैयार भांग की खेप को निकालने के लिए नेपाली बुला लिए हैं लेकिन पुलिस इससे बेखबर है। मणिकर्ण घाटी आने वाली हरिद्वार-मणिकर्ण बस में इन दिनों काफी संख्या में नेपाली आ रहे हैं। मणिकर्ण घाटी के जरी, कसोल व अन्य क्षेत्रों में भी नेपालियों की गतिविधियां बढ़ गई हैं।
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सेब सीजन समाप्त होने पर नेपालियों के आने का मकसद सिर्फ चरस की खेप निकालने में माफिया की मदद करना रहता है। मणिकर्ण घाटी में बिना पुलिस वेरीफिकेशन के पहुंच रहे नेपालियों को लेकर घाटी के लोग चिंतित हैं। लोगों ने अंदेशा जताया है कि बिना वेरीफिकेशन के यह लोग कोई भी घटना को अंजाम दे सकते हैं। इनका पुलिस के पास भी कोई रिकॉर्ड नहीं है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार घाटी के दुर्गम क्षेत्रों में बीजी गई भांग पकने लगी है। भांग में छंटाई का कार्य इन दिनों किया जा रहा है। 15 सिंतबर के बाद भांग को निकालने का काम शुरू कर दिया जाएगा। इसके लिए सबसे बढ़िया मजदूर नेपाली ही रहते हैं। जो डेरा लगाकर ऐसे दुर्गम स्थानों में डटे रहते हैं। हालांकि पुलिस ने दावा किया था कि पुलिस सैटेलाइट के माध्यम से भांग की खेती पर नजर रखेगी। लेकिन घाटी में सैकड़ों बीघा वन भूमि पर अभी भी चरस लहलहा रही है। जिसे अभी तक नष्ट नहीं किया जा सका है। अगर पुलिस समय पर इस चरस की खेप को नष्ट नहीं करती है तो इस चरस को निकालकर माफिया करोड़ों की चांदी कूटेगा। इस संबंध में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक राजकुमार चंदेल ने कहा कि बाहर से आ रहे इन नेपालियों पर नजर रखने के लिए मणिकर्ण व जरी चौकियों के प्रभारियों को निर्देश दिए जाएंगे। उन्होंने कहा कि अगर नेपाली चरस निकालने के इरादे से आए हैं तो निश्चित रूप से कार्रवाई की जाएगी।
मालिक व मजदूरों के बीच होती है 50-50 की डील
चरस माफिया व नेपालियों के बीच चरस को निकालने के एवज में 50-50 की डील होती है। जिसके तहत नेपाली भांग निकालने से लेकर सारा काम स्वयं करते हैं। माल तैयार कर वह मालिक को देते हैं। मालिक को बिना कोई रिस्क लिए चरस का 50 प्रतिशत हिस्सा मिलता है।
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