संवाद न्यूज एजेंसी
धर्मशाला। पंचायतों का पांच वर्षीय कार्यकाल शनिवार को समाप्त हो गया। इसी बीच कांगड़ा जिले के धर्मशाला खंड से एक ऐसी तस्वीर सामने आई, जो लोकतांत्रिक भागीदारी पर सवाल खड़े करती है। ब्लॉक की कुल 27 पंचायतों में से 16 पंचायतें अपने कार्यकाल के अंतिम दौर में भी ग्रामसभा का कोरम (न्यूनतम अनिवार्य उपस्थिति) जुटाने में नाकाम रहीं।
ग्रामसभा पंचायत की संसद है, जहां गांव की तरक्की का रोडमैप तैयार किया जाता है। नियमानुसार जब तक कुल मतदाताओं का एक निश्चित हिस्सा बैठक में मौजूद न हो तब तक कोई भी विकास प्रस्ताव पारित नहीं किया जा सकता। प्रशासन ने पिछले तीन महीनों में कई बार ग्रामसभा बुलाने के निर्देश दिए। मगर खंड की 27 में से 16 पंचायतें (करीब 60%) बार-बार प्रयास के बावजूद ग्रामीणों को बैठक तक लाने में विफल रहीं।
इस कारण मनरेगा के शेल्फ, नई सड़कों के निर्माण, डंगे और नालियों जैसे दर्जनों महत्वपूर्ण प्रस्ताव बिना मंजूरी के लटक गए। ग्रामीणों में अमित कुमार, सुरेश कुमार, नरेंद्र कुमार, राम किशन और त्रिलोक ने इस स्थिति पर बेबाकी से अपनी राय रखी। उनका मानना है कि कार्यकाल खत्म होने की कगार पर था, इसलिए लोगों को लगा कि अब नए प्रधान के आने पर ही बात करेंगे। कई गांवों में मुनादी या सोशल मीडिया के जरिए दी गई सूचना समय पर घर-घर नहीं पहुंची। इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में इस समय लोग कृषि कार्यों में व्यस्त थे, जिससे ग्रामसभा प्राथमिकता से बाहर हो गई।
अब इन 16 पंचायतों में विकास की चाबी नई चुनी जाने वाली पंचायतों के हाथ में होगी। पिछला बकाया काम और नए साल के लक्ष्य, दोनों का दबाव नई पंचायत बॉडी पर रहेगा।