धर्मशाला। पहाड़ों में जमीन पर बिखरी चीड़ की पत्तियां भले ही लोगों के लिए कूड़ा हों लेकिन रैत की 56 वर्षीय सुदर्शना कुमारी ने इन्हीं पत्तियों को सोना समझकर तराशा और रोजगार का रास्ता खोज लिया।
वर्ष 2007 में इन पत्तियों से सजावटी सामान बनाने का शुरू किया उनका छोटा सा प्रयोग आज सालाना करीब आठ लाख रुपये की कमाई का जरिया बन चुका है। सुदर्शना खुद आत्मनिर्भर हुईं ही, साथ ही 35 महिलाओं को घर बैठे रोजगार से जोड़ा। ये महिलाएं भी हर महीने छह से 10 हजार रुपये तक कमा रही हैं।
यही नहीं, हिमाचल और जम्मू-कश्मीर की करीब सात हजार महिलाओं को चीड़ की पत्तियों से उत्पाद बनाने का प्रशिक्षण देकर वह इस हुनर को गांव-गांव तक पहुंचा चुकी हैं।
वर्ष 1999 में स्वयं सहायता समूह से जुड़ने वाली सुदर्शना का लक्ष्य शुरुआत से ही महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना था। आज करीब एक हजार स्वयं सहायता समूहों से लगभग 10 हजार महिलाओं के जुड़ने का दावा उनके लंबे प्रयासों की कहानी कहता है।
चीड़ की पत्तियों से वह बॉक्स, फूलदान, टेबल मैट, पेन स्टैंड और ट्रे समेत कई सजावटी और उपयोगी सामान तैयार करती हैं। धीरे-धीरे इस हुनर को उन्होंने कारोबार का रूप दिया और दूसरी महिलाओं को भी इससे जोड़ती चली गईं।
महिला सशक्तीकरण के क्षेत्र में उनके योगदान को देखते हुए वर्ष 2018 में उन्हें हीरो ऑफ द स्टेट अवार्ड से सम्मानित किया गया। इसी वर्ष वह निफ्ट से भी जुड़ीं और बच्चों को स्थानीय संसाधनों से उपयोगी उत्पाद तैयार करने के लिए प्रेरित किया।
कोरोना में राखियों ने दिखाई नई राह
कोरोना काल में बाजार और रोजगार के साधन प्रभावित हुए तो सुदर्शना ने चीड़ की पत्तियों को राखी में ढालने का प्रयोग किया। वर्ष 2020 के लॉकडाउन में उन्होंने पहली बार केवल 10 राखियां बनाकर डीसी कार्यालय में भेजीं। राखियां पसंद आने के बाद उन्होंने अन्य महिलाओं को भी इस काम से जोड़ा। इस बार उन्होंने करीब 250 राखियां तैयार की हैं, जिनकी कीमत 20 से 25 रुपये तक बेची हैं।
पहाड़ों में संसाधनों की कमी नहीं है, जरूरत उन्हें पहचानकर सही तरीके से इस्तेमाल करने की है। स्थानीय संसाधनों को बाजार से जोड़कर महिलाएं घर के कामकाज के साथ अपनी आमदनी बढ़ा सकती हैं। सुदर्शना, रैत