धर्मशाला। कला की कोई सीमा नहीं होती और न ही इसे शुरू करने की कोई उम्र। इसे चरितार्थ किया है जयपुर की नीलू कंवारियां ने, जिन्होंने परिवार की जिम्मेदारियां निभाते हुए 30 साल पहले घर की चहारदीवारी से अपनी कला यात्रा शुरू की थी। आज उनकी कलाकृतियां दुबई, इंडोनेशिया और युगांडा जैसे देशों की दीर्घाओं की शोभा बढ़ा रही हैं।
कांगड़ा कला संग्रहालय में आयोजित तीन दिवसीय भारत-मलयेशिया कला प्रदर्शनी के समापन पर नीलू की प्रेरक कहानी मुख्य आकर्षण रही। बचपन से ही हस्तशिल्प के माहौल में पली-बढ़ी नीलू ने बताया कि शादी के बाद बच्चों की परवरिश के साथ उन्होंने एब्स्ट्रैक्ट आर्ट (अमूर्त कला) को अपनी अभिव्यक्ति का जरिया बनाया, जिसमें उन्हें अपने पति और बच्चों का भरपूर सहयोग मिला।
नीलू के अनुसार उनकी पेंटिंग मात्र रंगों का खेल नहीं, बल्कि मानव और प्रकृति के बीच के गहरे संबंधों का आइना हैं। उन्होंने बताया कि उनकी कृतियों में बनी सघन आकृतियां समाज की परंपराओं, स्मृतियों और रोजमर्रा की चुनौतियों का प्रतीक हैं। पेंटिंग के केंद्र में मौजूद लाल रंग जीवन की ऊर्जा और संघर्ष के बीच जीवित रहने वाली आशा को दर्शाता है।
नीलू मानती हैं कि जीवन निरंतर संघर्ष और अनुकूलन की एक प्रक्रिया है, जिसे वे अपनी कला के माध्यम से कैनवास पर उतारती हैं। धर्मशाला में यह उनकी तीसरी प्रदर्शनी थी, जिसमें उनकी सहनशीलता और संतुलन विषय पर आधारित कृतियों को काफी सराहना मिली।
कांगड़ा कला संग्रहालय की अध्यक्ष रीतु मलकोटिया ने बताया कि तीन दिनों तक चली इस प्रदर्शनी में भारत और मलयेशिया के 22 कलाकारों की 42 उत्कृष्ट कृतियां प्रदर्शित की गईं। प्रदर्शनी का मुख्य उद्देश्य स्थानीय व बाहरी पर्यटकों को अंतरराष्ट्रीय स्तर की कला से रूबरू करवाना और उभरते कलाकारों को एक बड़ा मंच प्रदान करना था।
नीलू कावरिया, जयपुर आर्टिस्ट