धर्मशाला। कभी जनवरी की ठंडी शामें त्योहारी सीजन से गर्म हो जाती थीं। दूर से बच्चों की टोलियों की आवाज आती थी सुंदर मुंदरिये हो, तेरा कौन विचारा हो... और समझ आ जाता था कि लोहड़ी आ गई है। हर दरवाजा खुलता, हर आंगन मुस्कराता, तिल-गुड़ की मिठास के साथ दुआएं भी बंटती थीं। वह सिर्फ लोहडी मांगना नहीं था, वह समाज के एक-दूसरे को पहचानने और अपनाने का त्योहार था। आज वही गलियां चुप हैं। कोई दस्तक नहीं, कोई लोकगीत नहीं, बस मोबाइल फोन पर चमकते त्योहार के स्टेटस हैं।
जिले के वरिष्ठ नागरिकों का कहना है कि लोहड़ी केवल आग जलाने या रस्म निभाने का पर्व नहीं, बल्कि पीढिय़ों को जोड़ने वाली परंपरा है। यदि युवा वर्ग इससे दूर होता गया तो आने वाले समय में यह लोक संस्कृति केवल किताबों और यादों तक ही सीमित रह जाएगी। हालांकि, अभी भी कुछ मोहल्लों में लोग फिर से बच्चों को बुलाकर सामूहिक लोहड़ी मना रहे हैं। कहीं स्कूलों में लोकगीत सिखाए जा रहे हैं। ये छोटी कोशिशें हैं, लेकिन यही परंपरा की बुझती आग में फूंकी गई हवा है।
आधुनिक युग में अब युवा लोहड़ी पर्व को नए युग के साथ गरी, मूंगफली, मखाने आदि से माला बनाकर गले में डालते हैं। परिवार में शामिल नए सदस्य के गले में यह माला पहनाई जाती है। इसमें नया पैदा हुआ बच्चा, नई बहु आदि शामिल हैं। यह परंपरा पिछले कुछ सालों से ही कांगड़ा में शुरू हुई है।
पहले घर-घर जाकर लोहड़ी मांगना बच्चों को संस्कार, बुजुर्गों को सम्मान देना और समाज को एक सूत्र में बांधना सिखाता था। आज हमने सुविधा, सुरक्षा और डिजिटल दुनिया के बदले उस अपनापन भरी दस्तक को खो दिया है। वर्तमान में लोग अजनबियों से डरते हैं। माता-पिता भी बच्चों को घर-घर भेजने से मना करते हैं। हमने केवल परंपरा नहीं, अपनापन खोया है। लोहड़ी का पर्व केवल पर्व नहीं है, बल्कि लोगों को आपस में जोड़ने का पर्व है। यह त्योहार लोगों को आपस में मिलजुल कर रहना सिखाता है।
-सावित्री देवी, महिला