ज्वालामुखी (कांगड़ा)। शक्तिपीठ ज्वालामुखी मंदिर न्यास की ओर से संचालित संस्कृत महाविद्यालय पर श्रद्धालुओं की ओर से अर्पित करोड़ों रुपये खर्च करने के बावजूद इस संस्थान की प्रोग्रेस रिपोर्ट हर वर्ष फिसड्डी होती जा रही है। मंदिर प्रशासन ने संस्कृत महाविद्यालय के भवन पर 1 करोड़ 75 लाख 85 हजार 681 रुपये खर्च कर भव्य भवन बनाया। इसी क्षेत्र में गरली के बलाहर में केंद्रीय संस्कृत विद्यापीठ बनने से संस्कृत के छात्रों का रुझान उस संस्थान की ओर बढ़ा हैं। इसी वजह से यहां हर वर्ष छात्रों की संख्या में कमी और छात्रों का इस संस्थान के कुप्रबंधन के चलते रुझान भी कम हो रहा है क्योंकि पिछले वर्ष शिमला विवि से मिली एक वर्ष के लिए अस्थायी संबद्धता के बाद भी संस्कृत महाविद्यालय में यूजीसी की गाइडलाइन अभी तक पूरी तरह से लागू नहीं हो पाई हैं।
पिछले रिकॉर्ड पर नजर दौड़ाई जाए तो यहां पर बच्चों की एडमिशन की संख्या दहाई का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाई है। वहीं अभिभावक भी अपने बच्चों को यहां से अन्य संस्थानों में भेजने में गुरेज नहीं कर रहे हैं। हालांकि मंदिर न्यास निशुल्क शिक्षा और भोजन बच्चों को देता है फिर भी इस संस्थान के प्रति छात्रों को वर्ष दर वर्ष रुझान कम हो रहा है।
इस संस्थान के पिछले एक दशक की प्रोग्रेस रिपोर्ट भी संतोषजनक नहीं हैं। इसलिए, अब यह संस्कृत महाविद्यालय सफेद हाथी साबित होने लगा है। वहीं मांग उठ रही है कि इस पैसे को यहां खर्च करने की बजाय श्रद्धालुओं की सुविधाओं पर मंदिर प्रबंधन पर खर्च करना चाहिए।
कार्यकारी मंदिर अधिकारी वेद प्रकाश ने बताया कि शिक्षण संस्थान में निशुल्क और अत्याधुनिक सुविधाएं मुहैया करवाने के लिए पूरी तरह से प्रबंधन प्रयासरत है।
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संस्कृत कॉलेज का स्टाफ रहता है हर समय नदारद
ज्वालामुखी संस्कृत कॉलेज की अगर बात करें तो अक्सर स्टाफ गायब ही रहता है और हर माह करीब 3 लाख रुपये का वेतन इस स्टाफ पर मंदिर प्रशासन खर्च कर रहा है। प्रबंधन के गैरजिम्मेदाराना रवैये से परेशान पूर्व मंदिर प्रशासन की ओर से हालांकि 25 अप्रैल 2016 को मंदिर अधिकारी की ओर से संस्कृत महाविद्यालय में छापा मारा गया उसमें प्रिंसिपल समेत पूरा स्टाफ नदारद पाया गया था। और पूरे स्टाफ को मंदिर प्रशासन ने नोटिस भी जारी किए थे।
कॉलेज का रिकॉर्ड बेहद खराब
ज्वालामुखी संस्कृत कॉलेज की प्रोग्रेस रिपोर्ट के रिकॉर्ड की बात कि जाए तो बेहद खराब है। पिछले वर्षों के आंकड़ों पर नजर दौड़ाई जाए तो 2012-13 में कुल छात्र संख्या 70, वर्ष- 2013-14 में 60, वर्ष 2014-15 में 40, 2015-16 में कुल छात्र संख्या 20। ये आंकड़े तो सिर्फ रजिस्टर में दर्ज निशुल्क एडमिशन के हैं, लेकिन जो छात्र यहां आए वे भी यहां एडमिशन लेकर बाद में कहीं और एडमिशन लेने का मजबूर हो गए। ये आंकड़े केवल मात्र रजिस्टर में ही दर्ज रह गए। 2016-17 में 20 छात्रों के दाखिले हुए हैं।
अन्यत्र मर्ज हो जाएगा तो बचेगा मंदिर का लाखों रुपया
शहर की मांग है कि इस संस्थान को अन्यत्र मर्ज किया जाए। ज्वालामुखी शहरवासियों की पुरजोर मांग है कि जब एडमिशन ही नही हैं तो फिर ऐसे संस्थान को चलाए रखने का क्या औचित्य है। शहर के 12 किलोमीटर की दूरी पर राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान है। अब तो ज्वालाजी डिग्री कॉलेज भी सरकारी हो गया है, जहां पर संस्कृत विषय पढ़ाना अनिवार्य है। ऐसे में इस संस्थान को मर्ज कर दिया जाए। इससे सालाना श्रद्धालुओं के चढ़ावे से हो रहे इस संस्थान के करीब 50 लाख रुपये के खर्च का बोझ हटेगा।