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आ लग जा गले, फिर सता मिले न मिले

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सुनील चड्ढा
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धर्मशाला। आ लग जा गले कि फिर सत्ता मिले न मिले...सियासी फायदे के लिए एक-दूसरे को कोसने वाले नेताओं के राजनीतिक मिलन को देख आम मतदाता यही पंक्तियां गुनगुना रहा है। सड़क तक पहुंचने को 10 किलोमीटर पैदल चलने वाले शाहपुर के कुठारना गांव के 3 हजार मतदाता, छह महीने बर्फ में कैद रहने वाले बड़ा भंगाल के करीब 70 मतदाताओं ने हर चुनाव में इसलिए वोट डाला, ताकि लोकतंत्र के पर्व में वे ईमानदार नेता और सरकार चुनें। लेकिन, लोकतंत्र के इन प्रहरियों की भावनाएं जाने बिना कुछ नेता सत्ता की चाह में विरोधियों संग जादू की झप्पी डाल रहे हैं।
नूरपुर से राकेश पठानिया का रणवीर निक्का और धर्मशाला से किशन कपूर और ओंकार नैहरिया का गले मिलना इसी की बानगी है। कांग्रेस के एसोसिएट विधायक रहे मनोहर धीमान ने जब भाजपा प्रदेशाध्यक्ष सतपाल सत्ती के गले मिलकर आजाद लड़ने से पलटी मार दी तो पिछली बार बागी होकर आजाद चुनाव लड़े जयसिंहपुर से रवि धीमान ने भाजपा में वापसी कर टिकट झटक लिया। एक-दूसरे को पानी पी पीकर कोसने वाले डॉ. राजेश, राजकुमार जसवाल, पूर्व विधायक सुरेंद्र काकू भी काजल के खिलाफ एक साथ सड़क पर उतर गए। भाजपा और कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़ने वाले विधायक पवन काजल ने इस बार हाथ का दामन थाम लिया। जवाली में अर्जुन ठाकुर के खिलाफ विरोध का झंडा उठाने वाले संजय गुलेरिया बाद में अर्जुन के सारथी बन गए। जवाली में ही सीपीएस नीरज भारती ने विरासत में ली कुर्सी पिता के लिए छोड़ कर घर की लक्ष्मी को घर में ही बिठा लिया।
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पिछले चुनाव में विप्लव परिवार की मुखालफत करने वाले योगराज अचानक विप्लव के संग हो लिए तो राजनीतिक गुरु शांता कुमार के खिलाफ जाकर प्रवीण शर्मा चुनाव में आजाद कूद गए हैं। पिछला चुनाव भाजपा और कांग्रेस के खिलाफ लड़ने वाले अरुण मेहरा इस बार भाजपा प्रत्याशी बन गए, वहीं फतेहपुर से भाजपा टिकट न मिलने पर राजन सुशांत और बलदेव ठाकुर आजाद लड़ रहे हैं। नेताओं की इस सियासी मौकापरस्ती से आम मतदान जरूर हैरान है।
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