कांगड़ा। ढाई दशक के इंतजार के बाद भी जब कोई काम परवान न चढ़े तो सियासत की किताब में इसे जनता को झूठे सब्जबाग दिखाना कहते हैं। यही हकीकत है और इसका सटीक उदाहरण तहसील चौक की खाली पड़ी भूमि पर लगी बचत भवन की शिलान्यास पट्टिका है। उस समय शांता कुमार मुख्यमंत्री थे और उन्होंने यहां बचत भवन का शिलान्यास कर नगरवासियों को एक नई सियासी उम्मीद दे दी। वक्त के सियासी थपेड़े झेलते-झेलते अब इस पट्टिका का रंग भी मुरझा गया है, लेकिन बचत भवन के नाम पर एक नई ईंट तक नहीं लग पाई। उसके बाद भाजपा के अलावा कांग्रेस की सरकारें भी आईं। सियासी मुद्दे को हवा देने के लिए बचत भवन का नाम बदलकर कांग्रेस सरकार में बज्रेश्वरी सदन रख दिया गया। बाकायदा मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने तहसील चौक पर बज्रेश्वरी सदन बनाने की घोषणा भी कर दी। चुनाव आए और यह मुद्दा फिर नेताओं की सियासी किताब के पन्नों में खो गया। अब सवाल यहीं से खड़ा होता है कि क्या शांता कुमार ने इस प्रोजेक्ट का बिना बजट के ही शिलान्यास कर दिया था?
बात 28 नवंबर 1992 की है। तहसील चौक पर बचत भवन बनाने के प्रोजेक्ट को असल रूप देने के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री शांता कुमार ने उन्हीं की सरकार में आईपीएच मंत्री रहे चौधरी विद्यासागर की उपस्थिति में इसका शिलान्यास किया। यहां बचत भवन और व्यापारिक परिसर बनाने का प्रोपोजल था। समय बीतता गया और भवन के लिए एक नए पैसे का काम शुरू नहीं हो पाया। उसके बाद सरकार बदली। उस दौरान भी किसी नेता ने शांता के इस प्रोजेक्ट को मूर्त रूप देने की कोशिश नहीं की। बाद में भाजपा की सरकार भी आई, लेकिन भवन के बजाय यहां सिर्फ वही शिलान्यास पट्टिका खड़ी रही जो आज भी अपनी जगह पर अटल है। इस बार स्थानीय भाजपा नेताओं ने उनके ही इस प्रोजेक्ट का मसला शांता के समक्ष उठाया। शांता ने काम शुरू करने के लिए दस लाख की राशि भेजी। राशि नगर परिषद के पास पहुंची। लेकिन राजस्व विभाग की जमीन नप को ट्रांसफर न होने से मामला अटक गया और पैसे वापस भेज दिए गए। इसी कांग्रेस के कार्यकाल में स्थानीय विधायक ने इस प्रस्तावित प्रोजेक्ट के इतिहास के बारे में मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह को अवगत करवाया और सीएम ने जनसभा में तहसील चौक पर बज्रेश्वरी सदन बनाने की घोषणा कर दी। बताया जा रहा है कि सदन में दो पहिया पार्किंग, रेहड़ी-फड़ी वालों के लिए जगह, शांपिग कांप्लेक्स, यात्रियों के लिए क्लॉक रूम की व्यवस्थाएं दी जानी थीं। चुनाव आए और तहसील चौक पर फीकी पड़ चुकी यह शिलान्यास पट्टिका आम जनता से यही कह रही है कि बिना इच्छा शक्ति से संभव काम भी असंभव दिखता है।