नूरपुर (कांगड़ा)। चुनावी बेला आते ही पिछले करीब दो दशक से राजनीतिक पालने में झूल रही नूरपुर को जिला का दर्जा दिलाने की मांग एक बार फिर हलके की सियासी फिजाओं में गूंजने लगी है। खासकर पड़ोसी विस क्षेत्र फतेहपुर के बाद इंदौरा हलके को भी एसडीएम ऑफिस की सौगात मिलने के बाद जिला कांगड़ा के सबसे पुराने उपमंडलों में शुमार नूरपुर की जनता भी अब नूरपुर को जिला का दर्जा मिलने की पैरवी करने लगे हैं। इसकी वजह भी है कि अगर फतेहपुर और इंदौरा में एसडीएम कार्यालय खोलने के पीछे विकास के दृष्टिकोण से जनता को सहूलियत देने की सियासी दलीलें दी जाती हैं तो फिर भौगोलिक दृष्टि से सूबे के राजनीतिक मानचित्र पर नूरपुर को जिले का दर्जा मिलने से न सिर्फ विकास में बाधक बनने वाली दूरियां सिमटकर आधी रह जाएंगी, बल्कि अतीत में राजनीतिक और प्रशासनिक आधार पर चार टुकड़ों में बंटने वाली ब्रिटिशकाल की सबसे पुरानी नूरपुर तहसील जो अब महज 43 पंचायतों में ही सिमटकर रह गई है, उसकी नूरपुर को जिला बनाने से कुछ हद तक भरपाई हो सकती है। हालांकि, इस मुद्दे पर दोनों राजनीतिक ही फिलहाल खामोश हैं। यह बात अलग है कि विकास के दृष्टिकोण से तहसीलों को एक इकाई का स्वरूप देने की कवायद में नए जिलों के पुनर्गठन की नींव खोदी जाती है तो इससे नूरपुर समेत इंदौरा, जवाली और फतेहपुर की जनता को भी फायदा होगा। क्योंकि नूरपुर सब डिवीजन मुख्यालय से धर्मशाला की दूरी करीब 63 किमी पड़ती है। इंदौरा तहसील से लोगों को अपने प्रशासनिक कामों के लिए सौ किलोमीटर से ज्यादा का सफर तय करना पड़ता है। जवाली उपमंडल के सीमांत इलाकों की जनता को जिला मुख्यालय धर्मशाला पहुंचने के लिए वाया जसूर 95 किमी और वाया 32 मील 58 किमी जाना पड़ता है। वहीं, जिला चंबा का भटियात (चुबाड़ी) विस क्षेत्र भी इसमें शामिल होता है तो वहां के लोगों को भी वाया जोत 55 किमी. और वाया बनीखेत 85 किमी का लंबा सफर तय करने से राहत मिलेगी। दो दशक पुरानी जिले की मांग करीब डेढ़ दशक पहले भाजपा-हिविकां गठबंधन सरकार में तत्कालीन भाजपा विधायक राकेश पठानिया ने नूरपुर को जिला का दर्जा दिलाने की आवाज बुलंद की थी। वर्ष 2002 में सत्ता के आखिरी पड़ाव पर एडीसी बिठाकर नए जिले की नींव रखने की कोशिश की गई थी, जहां एडीसी ने चार माह से ज्यादा प्रशासनिक कार्य देखा। लेकिन, सत्ता परिवर्तन के चलते जनता को एडीसी दफ्तर से हाथ धोना पड़ा। पूर्व धूमल सरकार में भी नए जिलों के गठन का मुद्दा जोरशोर से उठा था, लेकिन भाजपा की अंदरूनी कलह के चलते जिलों के पुनर्गठन की मुहिम सिरे नहीं चढ़ पाई।
नूरपुर में जुड़ सकते हैं ये उपमंडल
अगर नूरपुर को जिला का दर्जा मिलता है तो नूरपुर उपमंडल के साथ इंदौरा, फतेहपुर और जवाली उपमंडलों के अलावा पड़ोसी जिला चंबा के भटियात उपमंडल को भी जोड़ा जा सकता है। क्योंकि भटियात क्षेत्र की जनता को जिला मुख्यालय चंबा की बजाय नूरपुर नजदीक पड़ता है। इसके साथ ही इंदौरा, फतेहपुर और जवाली के भी सीमांत क्षेत्र के लोगों को काफी राहत मिलेगी।
क्या कहते हैं सियासतदान
भाजपा प्रत्याशी एवं पूर्व विधायक राकेश पठानिया ने कहा कि नूरपुर को जिला बनाने की मांग कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं है। बल्कि नूरपुरवासियों की अस्मिता को बचाने की लड़ाई है और इसके लिए हमेशा आवाज बुलंद की है। अगर लोगों की सहूलियत के पैमाने पर नई प्रशासनिक इकाइयां (उपमंडल) गठित की जा सकती हैं तो नूरपुर को जिला का दर्जा क्यों नहीं मिल सकता?
नूरपुर को भी मिले प्राथमिकता : महाजन
कांग्रेस प्रत्याशी एवं विधायक अजय महाजन ने कहा कि यह महज एक चुनावी स्टंट है। जिले के पुनर्गठन पर उनका स्टेंड स्पष्ट है कि देर-सवेर जब भी नए जिले बनते हैं तो नूरपुर को भी प्राथमिकता मिले। साथ ही उनका यह प्रयास है कि नूरपुर को एजुकेशन हब और नगलाहड़ को इंडस्ट्री एरिया के रूप में विकसित किया जाए।