शोध के निष्कर्षों के अनुसार पश्चिमी ब्यास बेसिन के इलाके भूजल की दृष्टि से सबसे समृद्ध पाए गए हैं। इसमें कांगड़ा जिला, देहरागोपीपुर, ज्वालामुखी, ज्वाली, नूरपुर, पौंग बांध क्षेत्र, धर्मशाला के निचले क्षेत्र और ऊना सीमा से सटे इलाके शामिल हैं। इन क्षेत्रों को बहुत अधिक और अधिक भूजल उपलब्धता वाले जोन में रखा गया है।
मध्य ब्यास बेसिन में मंडी जिला, बल्ह घाटी, सुंदरनगर और जोगिंद्रनगर जैसे क्षेत्र आते हैं। इन इलाकों में भूजल उपलब्धता को मध्यम श्रेणी में दर्ज किया गया है। वहीं, पूर्वी ब्यास बेसिन के पर्वतीय क्षेत्रों में स्थिति चिंताजनक पाई गई है। कुल्लू, मनाली, बंजार, आनी, ऊपरी मंडी के पहाड़ी इलाके और रोहतांग दर्रे के आसपास का हिमालयी क्षेत्र कम और बेहद कम भूजल उपलब्धता वाले जोन में शामिल किया गया है। शोध के अनुसार इन इलाकों में भविष्य में जल संकट और गहराने की आशंका है।
यह शोध आईआईटी मंडी के स्कूल ऑफ सिविल एंड एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग द्वारा किया गया है। इस अध्ययन को फैकल्टी सदस्य डेरिक्स पी शुक्ला, दीपक स्वामी और शोधार्थी उत्सव राजपूत ने अंजाम दिया है। शोध को अंतरराष्ट्रीय जर्नल एनवायरमेंटल अर्थ साइंसेज में प्रकाशित किया गया है। अध्ययन के तहत वर्ष 2022 के लिए ब्यास बेसिन का भूजल उपलब्धता नक्शा तैयार किया गया है, जिसके माध्यम से पूरे बेसिन को भूजल की उपलब्धता के आधार पर अलग-अलग जोन में वर्गीकृत किया गया है। शोधकर्ताओं का मानना है कि यह अध्ययन हिमाचल ही नहीं, बल्कि देश के अन्य पर्वतीय और नदी बेसिन क्षेत्रों में भी भूजल प्रबंधन के लिए मार्गदर्शक साबित हो सकता है।
क्या है नई वैज्ञानिक पद्धति
इस शोध में किसी नई मशीन या उपकरण का इस्तेमाल नहीं किया गया, बल्कि भूजल आकलन की एक नई और आधुनिक वैज्ञानिक पद्धति अपनाई गई है। इस पद्धति के तीन मुख्य आधार हैं -
- रिमोट सेंसिंग : उपग्रह से प्राप्त आंकड़ों के जरिए वर्षा, भूमि उपयोग, ढाल और ऊंचाई जैसी जानकारियां जुटाई गईं
- जीआईएस आधारित मल्टी-लेयर विश्लेषण : भूविज्ञान, मिट्टी, ढाल, ड्रेनेज डेंसिटी समेत कुल 10 परतों को जीआईएस प्लेटफॉर्म पर एकीकृत कर विश्लेषण किया गया
- भविष्य का अनुमान : इन सभी आंकड़ों के आधार पर न केवल वर्तमान, बल्कि भविष्य की भूजल स्थिति का भी अनुमान लगाया गया