लाहौल में चिनाव नदी की धारा पर प्रस्तावित 300 मेगावाट की विद्युत परियोजना की आड़ में हजारों हरे-भरे पेड़ काटे जाएंगे, जबकि एक दर्जन परिवारों को विस्थापन का दंश झेलना होगा।
राज्य सरकार ने मोजर बियर कंपनी को तीन सौ मेगावाट की सैली परियोजना आवंटित की है। परियोजना के लिए चिनाव की धारा पर करीब सौ मीटर ऊंचा बांध प्रस्तावित है। वन विभाग के आंकडे़ बताते हैं कि परियोजना के लिए बनने वाले बांध के दायरे में आने वाले 57290 छोटे-बडे़ हरे पेड़ों पर कुल्हाड़ी चलेगी।
वन विभाग ने पेड़ों की गिनती प्रक्रिया पूरी करने के बाद राज्य सरकार के माध्यम से रिपोर्ट केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय को भेज दी है। विभाग ने इन पेड़ों की भरपाई के लिए कंपनी के लिए 77 करोड़ 74 लाख 52 हजार रुपये की डैमेज रिपोर्ट तैयार की है।
आंकड़ों के मुताबिक इस परियोजना के निर्माण में जुनिफर के 6321, दियार के 20000, कायल के 24310, रोबिनिया के 4823 और वैली के करीब 1500 पेड़ों पर कुल्हाड़ी चलेगी। इसके अलावा करीब तीन सौ छोटे पेड़ भी शामिल हैं।
बताया जा रहा है कि लाहौल-स्पीति जैसे इलाके की ठंडी आबोहवा में दियार और कायल के एक पेड़ को अपनी यौवन तक पनपने में लगभग 100 साल लग जाते हैं। इन क्षेत्रों में पेड़ों की ग्रोथ रेट बेहद धीमी है।
वन विभाग के रिकार्ड बताते हैं लाहौल-स्पीति के कुल भू-भाग के महज दो फीसदी हिस्से पर ही वन हैं। लाहौल वन मंडल अधिकारी हीरालाल राणा ने सैली परियोजना की जद में 57290 छोटे-बड़े हरे पेड़ों के आने की पुष्टि की है।
राणा ने बताया कि इसकी रिपोर्ट केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को भेज दी गई है। हालांकि, पर्यावरण संरक्षण के काम में जुटी गैर सरकारी संस्था लाहौल वन्य प्राणी एवं पर्यावरण सुरक्षा समिति का दावा है कि परियोजना की आड़ में लगभग 1.50 लाख पेड़ों की बलि चढ़ेगी।