न्यायाधीश विरेंद्र सिंह की अदालत ने सुनवाई के दौरान पाया कि मुख्य आरोपी सतेंद्र मोहन ने पहले ही बिजली बोर्ड के साथ मामला सुलझा लिया था और 86,196 का जुर्माना बतौर पेनल्टी जमा कर दिया था। कोर्ट ने कहा कि जब सक्षम प्राधिकारी ने बिजली अधिनियम की धारा 152 के तहत अपराध को कंपाउंड कर दिया है, तो पुलिस द्वारा दाखिल चार्जशीट का आधार ही खत्म हो जाता है। कोर्ट ने जेई और एसडीओ जैसे अधिकारियों के खिलाफ लगाए गए भ्रष्टाचार के आरोपों को भी खारिज कर दिया, क्योंकि अभियोजन पक्ष उनके खिलाफ कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर पाया।
आरोपी ठेकेदार को भी राहत मिली, जिन्होंने केवल टेस्ट रिपोर्ट दी थी। कोर्ट ने माना कि बिजली कनेक्शन जारी करना बोर्ड के अधिकारियों का काम था, न कि ठेकेदार का। हाईकोर्ट ने निचली अदालत (स्पेशल जज, नाहन) द्वारा आरोपियों के खिलाफ आरोप तय करने के आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने सतेंद्र मोहन, सुरेंद्र कुमार सैनी और सुशील कुमार गोयल सहित कई अन्य को सभी आरोपों से डिस्चार्ज करने का आदेश दिया। इसके साथ ही राज्य सरकार द्वारा कुछ अन्य आरोपियों को छोड़ देने के खिलाफ दायर की गई पुनरीक्षण याचिका को भी खारिज कर दिया।