सरकार का मानना है कि कई न्यायिक आदेशों के कारण राज्य के खजाने पर भारी वित्तीय बोझ पड़ता है। कई बार व्यक्तिगत मामलों में दिए गए लाभ बाद में बड़ी संख्या में कर्मचारियों अथवा अन्य वर्गों के लिए मिसाल बन जाते हैं। इससे सरकार पर अप्रत्याशित और दीर्घकालिक वित्तीय देनदारियां बढ़ जाती हैं। सरकार ने पाया है कि कई मामलों में विभागीय या क्षेत्रीय स्तर पर अदालत के आदेशों को लागू करने, रियायतें देने अथवा अपील न करने जैसे निर्णय बिना व्यापक वित्तीय मूल्यांकन के ले लिए जाते हैं। ऐसे निर्णयों का प्रभाव समान स्थिति वाले अन्य कर्मचारियों, भविष्य के मुकदमों, वरिष्ठता व्यवस्था, कैडर संरचना और भर्ती प्रणाली पर भी पड़ता है।
नए निर्देशों के तहत उन सभी मामलों की गहन समीक्षा की जाएगी जिनमें राज्य पर महत्वपूर्ण वित्तीय प्रभाव पड़ने की संभावना हो या जो भविष्य में न्यायिक मिसाल बन सकते हों। संबंधित प्रशासनिक विभाग को किसी भी अंतिम निर्णय से पहले वित्त विभाग से परामर्श लेना अनिवार्य होगा। कानूनी पहलुओं और भविष्य की न्यायिक रणनीति के लिए विधि विभाग अथवा महाधिवक्ता की राय ली जाएगी। वहीं, यदि मामला सेवा शर्तों या कर्मचारियों से जुड़ा है तो कार्मिक विभाग की सलाह भी आवश्यक होगी।
राज्य सरकार के नियंत्रण वाले सभी विभागों, बोर्डों, निगमों, विश्वविद्यालयों और स्वायत्त निकायों को इन निर्देशों का सख्ती से पालन करने के आदेश दिए गए हैं। सरकार ने चेतावनी दी है कि निर्धारित प्रक्रिया से किसी भी प्रकार की अनदेखी को गंभीरता से लिया जाएगा और संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी तय की जाएगी।