ईंट निर्माण में इस्तेमाल होने वाला कोयला पिछले कुछ समय में दोगुने से अधिक महंगा हो गया है। भट्ठा संचालकों के अनुसार अमेरिका से आयातित कोयला, जो पहले 10 से 11 हजार रुपये प्रति टन मिलता था, अब 19 हजार रुपये प्रति टन तक पहुंच चुका है। कोयले की कीमत बढ़ने से उत्पादन लागत में भारी वृद्धि हुई है, जिसका सीधा असर बाजार में ईंटों के दाम पर पड़ा है। इसके साथ ही डीजल और परिवहन खर्च में बढ़ोतरी ने भी लागत को और बढ़ा दिया है। भट्ठा संचालकों का कहना है कि मौजूदा परिस्थितियों में पुरानी दरों पर ईंटें बेचना संभव नहीं रह गया है।
इस वर्ष हुई अनियमित और बेमौसमी बारिश ने ईंट उद्योग को गहरा नुकसान पहुंचाया है। भट्ठों में तैयार की जा रही लाखों कच्ची ईंटें बारिश में खराब हो गईं। इन ईंटों के निर्माण पर खर्च हुई मजदूरी और अन्य लागत भी डूब गई। उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि एक-एक भट्ठे को इस सीजन में 30 से 50 लाख रुपये तक का नुकसान झेलना पड़ा है। पहले जहां बारिश का असर मुख्य रूप से मानसून तक सीमित रहता था, वहीं अब मौसम की अनिश्चितता के कारण सालभर उत्पादन प्रभावित हो रहा है।
कुछ महीने पहले ईंट खरीदना बेहतर विकल्प था, लेकिन अब दाम आसमान छू रहे हैं। सीमेंट और सरिया पहले ही महंगे हैं। एक सामान्य घर बनाने में आठ से दस लाख रुपये तक का खर्च आ रहा है। सरकार को आम आदमी को राहत देने के लिए कदम उठाने चाहिए।- सतीश कुमार, स्थानीय निवासी।
ईंट घर निर्माण की सबसे अहम सामग्री है। अचानक बढ़े दामों ने लोगों को विकल्प तलाशने पर मजबूर कर दिया है। कुछ वर्ष पहले ईंटें चार से पांच हजार रुपये प्रति हजार मिल जाती थीं, लेकिन अब घर बनाना आम आदमी की पहुंच से दूर होता जा रहा है।-नरोत्तम शर्मा, स्थानीय निवासी।
सलोह में वर्षों से ईंट भट्ठा चला रहे मूल राज बताते हैं कि उद्योग कई चुनौतियों से जूझ रहा है। मजदूरों की कमी, महंगा कोयला और बेमौसमी बारिश ने कारोबार को घाटे का सौदा बना दिया है। उन्होंने कहा कि पहले केवल बरसात के मौसम में काम प्रभावित होता था, लेकिन अब कभी भी बारिश हो जाती है और तैयार हो रहा माल खराब हो जाता है। पिता की याद में भट्ठा चला रहे हैं, लेकिन लाभ नाममात्र का भी नहीं बचा है।
ईंट भट्ठा एसोसिएशन के प्रधान पोहू लाल भारद्वाज ने बताया कि लगातार बढ़ती उत्पादन लागत के कारण ईंटों के दाम बढ़े हैं। उन्होंने कहा, बारिश से पिछले एक वर्ष में भारी नुकसान हुआ है। कोयला और तेल दोनों महंगे हुए हैं। ईंट निर्माण बिना कोयले के संभव नहीं है। यदि आने वाले समय में कोयले की कीमतों में कमी आती है तो ईंटों के दाम भी घट सकते हैं।