आईजीएमसी रेडियोलॉजी प्रोफेसर पद की पदोन्नति पर हाईकोर्ट की रोक
प्रदेश हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज (आईजीएमसी), शिमला के रेडियोलॉजी विभाग में प्रोफेसर पद पर हुई हालिया पदोन्नति के आदेश पर रोक लगा दी है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने 19 अगस्त 2026 को जारी प्रोफेसर (रेडियोलॉजी) पद के पदोन्नति आदेश के क्रियान्वयन पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाई है। खंडपीठ ने मुकेश सूर्य की ओर से दायर अपील पर सुनवाई करते हुए यह अंतरिम आदेश जारी किया। याचिकाकर्ता का आरोप है कि वर्ष 2015 में हुई विभागीय पदोन्नति समिति की बैठक में निजी प्रतिवादी को लाभ पहुंचाने के लिए नियमों को ताक पर रखा गया था। आरोप है कि तत्कालीन चिकित्सा शिक्षा एवं अनुसंधान निदेशक ने निजी प्रतिवादी की लगातार चार वर्षों की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट की ग्रेडिंग को बिना किसी ठोस कारण के ‘वेरी गुड’ से बढ़ाकर ‘आउटस्टैंडिंग’ कर दिया था। याचिकाकर्ता ने दलील दी कि एकल न्यायाधीश ने याचिका को देरी के आधार पर खारिज किया था, जबकि विभाग ने वर्ष 2015 से 2020 के बीच असिस्टेंट प्रोफेसरों की कोई अंतिम या अस्थायी वरिष्ठता सूची जारी नहीं की थी। इस वजह से याचिकाकर्ता को योग्यता सूची में कथित हेरफेर की जानकारी समय पर नहीं मिल सकी। हाईकोर्ट की खंडपीठ ने इस मामले में दायर अपील को नियमित सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया है।
नर्सिंग संस्थान में बीएससी की सीटें घटाने पर सरकार से जवाब तलब
प्रदेश हाईकोर्ट ने बैजनाथ (पपरोला) के एक नर्सिंग संस्थान में बीएससी नर्सिंग की वार्षिक सीटें 30 से घटाकर 10 करने पर राज्य सरकार को नोटिस जारी करते हुए जवाब तलब किया है। न्यायाधीश ज्योत्सना रिवाल दुआ की अदालत ने सरकार को आदेश दिया है कि वह तीन सप्ताह के भीतर इस संबंध में अपना विस्तृत जवाब दाखिल करे। अदालत ने यह आदेश शहीद दीवान चंद कटोच नर्सिंग कॉलेज की ओर से दायर याचिका पर दिए हैं। मामले की अगली सुनवाई 17 सितंबर को होगी। याचिकाकर्ता संस्थान की ओर से अदालत को बताया कि हाईकोर्ट की ओर से 24 नवंबर 2025 को जारी एक फैसले के अनुपालन में प्रदेश सरकार ने 10 जुलाई 2026 को एक आदेश जारी किया था। इस आदेश में सरकार ने मंत्रिमंडल की मंजूरी के अधीन संस्थान को 30 सीटों की वार्षिक क्षमता के साथ बीएससी नर्सिंग कॉलेज स्थापित करने का आश्वासन दिया था। सरकार के इसी आधिकारिक आश्वासन के आधार पर कोर्ट ने 13 जुलाई 2026 को इस मामले से जुड़ी अवमानना याचिका का निपटारा कर दिया था। याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि जब सरकार ने खुद 30 सीटों की मंजूरी देने का भरोसा दिलाया था, तो 31 जुलाई 2026 को जारी अंतिम आदेश में इसे घटाकर अचानक 10 सीटें करने का कोई कानूनी आधार नहीं बनता। संस्थान का आरोप है कि सरकार ने सीटों की संख्या में इतनी बड़ी कटौती करने का कोई स्पष्ट और तार्किक कारण भी नहीं बताया है।
2011 और 2012 में जारी की गई अंडर सेक्रेटरी पद की वरिष्ठता सूची रद्द
प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी विभागीय परीक्षा का परिणाम आधिकारिक वेबसाइट पर अपलोड कर दिया जाता है तो वही परीक्षा पास करने की वास्तविक तिथि मानी जाएगी। अदालत ने 8 अगस्त 2012 को जारी अंतिम वरिष्ठता सूची को भी रद्द कर दिया है। राज्य सरकार को आदेश दिया गया है कि याचिकाकर्ताओं को उनके जूनियरों की पदोन्नति की तिथि से ही अंडर सेक्रेटरी के पद पर सभी परिणामी लाभों के साथ पदोन्नति दी जाए। कोर्ट ने कहा कि राजपत्र में आधिकारिक अधिसूचना जारी होने में हुई देरी के आधार पर योग्य कर्मचारियों को पदोन्नति और वरिष्ठता से वंचित नहीं किया जा सकता। न्यायाधीश जिया लाल भारद्वाज की अदालत ने स्पष्ट किया कि आईटी एक्ट के लागू होने के बाद डिजिटल माध्यम से दी गई जानकारी पूरी तरह वैध है।
जैसे ही 1 अक्टूबर 2008 को परीक्षा का परिणाम वेबसाइट पर अपलोड किया गया, वह सार्वजनिक हो गया और याचिकाकर्ताओं ने योग्यता हासिल कर ली। अदालत ने यह फैसला विजय कुमार शर्मा की ओर से दायर याचिका को स्वीकार करते हुए सुनाया। उल्लेखनीय है कि याचिकाकर्ताओं ने वर्ष 2011 और 2012 में जारी अंडर सेक्रेटरी पद की वरिष्ठता सूचियों को चुनौती दी थी। याचिकाकर्ताओं ने सितंबर 2008 में आयोजित विभागीय परीक्षा उत्तीर्ण की थी, जिसका परिणाम 1 अक्टूबर 2008 को विभाग की वेबसाइट पर अपलोड कर दिया गया था। हालांकि, सरकार ने परिणाम की संयुक्त अधिसूचना 11 नवंबर 2008 को जारी की। इस बीच, 4 नवंबर 2008 को अंडर सेक्रेटरी के पद खाली हुए। विभाग ने याचिकाकर्ताओं को यह कहते हुए अयोग्य घोषित कर दिया कि 4 नवंबर तक उनका परिणाम आधिकारिक तौर पर अधिसूचित नहीं हुआ था। इसके चलते उनके जूनियरों को वर्ष 2008 की रिक्तियों पर पदोन्नत कर दिया गया, जबकि याचिकाकर्ताओं को 2009 की रिक्तियों में धकेल दिया गया।