सेंसर की मदद से ग्लेशियरों के तापमान, आर्द्रता, बर्फ की गहराई को मापा जाएगा। फ्लो मीटर की मदद से नदियों और ग्लेशियरों से निकलने वाले पानी की मात्रा को मापा जाएगा, जिससे ग्लेशियरों के पिघलने की दर का सटीक आकलन किया जा सके। कैमरों की मदद से समय-समय पर ग्लेशियरों की तस्वीरें ली जाएंगी। इससे इनके आकार-संरचना में होने वाले बदलाव को ट्रैक किया जाएगा। ग्लेशियरों के पिघलने से उत्पन्न होने वाली संभावित बाढ़ जैसी आपदाओं के लिए पूर्व चेतावनी प्रणाली भी विकसित होगी, जिससे समय रहते खतरे की जानकारी मिले। हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ते तापमान की वजह से ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। इससे ऊंचाई वाले इलाकों में करीब 850 छोटी-बड़ी झीलें बन चुकी हैं। 650 से ज्यादा झीलें हिमाचल के लिहाज से संवेदनशील हैं। झीलों पर विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं पर्यावरण परिषद का सेंटर फॉर क्लाइमेट चेंज लगातार अध्ययन कर रहा है।
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ग्लेशियरों की निगरानी के लिए सेंसर, फ्लो मीटर और कैमरे लगाए जाएंगे, जिससे पूर्व चेतावनी प्रणाली की मदद से बाढ़ जैसी आपदाओं की अग्रिम जानकारी मिल सके। खतरे को लेकर आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के कंट्रोल रूम में सूचना मिल जाएगी और तुरंत एहतियाती कदम उठाए जाएंगे। - डीसी राणा, निदेशक, हिमाचल प्रदेश राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण