हिमाचल प्रदेश में भोलू नस्ल की गाय पर अस्तित्व का संकट मंडरा रहा है। इसे पहाड़ी गाय और गौरी भी कहा जाता है। प्रदेश के बिलासपुर जिले में करीब 128 साल पहले शुरू हुए नलवाड़ मेले में इस गाय की खासियत का पता चला। यह गाय दूध के लिए मशहूर है। आधुनिकता के दौर में इस नस्ल की गायों की संख्या तेजी से घटी है।
चंबा, कांगड़ा, किन्नौर, कुल्लू, मंडी, शिमला, सिरमौर, लाहौल-स्पीति में खेती और माल ढुलाई में भी इस नस्ल के गोवंश का उपयोग किया जाता है। इस नस्ल की गाय की दूध की मात्रा देसी गाय के मुकाबले डेढ़ गुना अधिक है। करीब 50 वर्ष पहले इस नस्ल की संख्या पूरे प्रदेश में तेजी से बढ़ी। लोगों ने खेती और दूध उत्पादन को बढ़ाने में इस नस्ल का पालन करना बेहतर समझा।
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प्रदेश में इस नस्ल की संख्या एक लाख के करीब पहुंच गई। इसके बाद खेती और दूध उत्पादन तकनीक में बदलाव आते गए। खेती में ट्रैक्टर का इस्तेमाल और दूध उत्पादन में अन्य कई गुना अधिक उत्पादन देने वाली गायों की नस्ल आ गईं। लोगों के घटते रुझान के बीच पहाड़ी गाय के बचाव को लेकर कोई गंभीरता नहीं दिखाई गई। आज इस नस्ल की संख्या घटकर 10,000 के आसपास रह गई हैं। अभी सिरमौर, सोलन, शिमला, बिलासपुर और मंडी के केवल दुर्गम इलाकों में इस नस्ल का पालन हो रहा है।