यह चालान पुलिस स्तर पर कंपाउंड (समझौता) नहीं हो सकता था। आरोपी कांस्टेबल ने उच्च अधिकारियों की अनुमति के बिना ऑनलाइन ई-चालान एप में बदलाव कर दिए। उसने कोर्ट में फाइन की रकम को शून्य और 5,000 दर्शाया, जबकि वाहन चालक से उसके वकील के माध्यम से 20,000 की राशि अपने व्यक्तिगत गूगल पे अकाउंट पर ट्रांसफर करवा ली। जांच में पाया गया कि यह 20,000 की राशि सरकारी ट्रेजरी (खजाने) में जमा ही नहीं की गई थी। इसके बाद आरोपी के खिलाफ धोखाधड़ी और जालसाजी के तहत एफआईआर दर्ज की गई। प्रारंभिक जांच के बाद दिसंबर 2023 में एसपी बिलासपुर ने कांस्टेबल को सेवा से बर्खास्त कर दिया था।
इस बर्खास्तगी के खिलाफ जब उसने पुलिस उपमहानिरीक्षक मंडी के समक्ष अपील की, तो डीआईजी ने पाया कि विभाग ने पंजाब पुलिस रूल्स के नियम 16.38 का तकनीकी रूप से पालन नहीं किया है इस तकनीकी खामी के आधार पर डीआईजी ने पुरानी विभागीय जांच को रद्द कर दिया और नियम 16.38 के तहत नए सिरे से जांच के आदेश दे दिए। कांस्टेबल ने नए सिरे से जांच कराने के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। दलील दी गई कि जब एक बार जांच रद्द हो गई है तो दोबारा जांच नहीं होनी चाहिए। हाईकोर्ट की खंडपीठ ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि तकनीकी आधार पर पिछली जांच रद्द होने का मतलब यह कतई नहीं है कि आरोपी को क्लीन चिट मिल गई है।