हिमाचल में हर साल करीब 50 हजार छोटे-बड़े पेड़ और एक लाख टन उपजाऊ मिट्टी बरसात के दौरान नदियों में बह रही है।
इसे समय रहते नहीं रोका गया तो उत्तराखंड जैसी त्रासदी हिमाचल को भी झेलनी पड़ सकती है।
हिमालय पर्यावरण अध्ययन एवं सुरक्षा संगठन ‘हेस्को’ ने अपने दो दशकों के शोध में इसे रेखांकित किया है।
शोध में पाया गया है कि हिमाचल की सतलुज, यमुना, ब्यास, पब्बर, गिरी, बाता एवं जलाल जैसी नदियां प्रतिवर्ष दो मीटर उपजाऊ भूमि का कटाव कर रही हैं।
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560 किलोमीटर का सफर तय करने वाली हिमाचल की 27 छोटी-बड़ी नदियां हरे पेड़ों एवं टनों उपजाऊ मिट्टी को बहा रही हैं।
इसका सीधा प्रभाव 4 से 12 हजार फीट की ऊंचाई वाली पर्वत शृंखलाओं पर पड़ रहा है। पहाड़ खोखले हो रहे हैं।
तस्वीरों में: तबाही के बाद राहत का इंतजार
पांच वर्षों के दौरान हिमालय का तापमान प्रतिवर्ष 0.5 से 1 डिग्री बढ़ रहा है। इससे हिमाचल के 69, उत्तराखंड के 72 एवं जम्मू-कश्मीर के 108 ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं।
पिछले 3 दशकों में हिमालय के ग्लेशियरों का आकार 356 किलोमीटर घट गया है, जिसका सीधा प्रभाव हिमालय के जल, जंगल, जमीन एवं जीवन पड़ रहा है।
तस्वीरों में: आसमान से बरसी आफत
‘हेस्को’ के निदेशक डॉ. अनिल प्रकाश जोशी मानते हैं कि हिमालयन राज्यों में त्रासदी के लिए लोग ही जिम्मेदार हैं। पहाड़ों का अवैज्ञानिक दोहन, जल, जंगल एवं जमीन का क्षरण इसके कारण हैं।
मैदानों में इमारतें ऊंची हो रहीं हैं और हिमालय की पर्वत श्रृंखलाएं साल दर साल घट रही हैं, यही त्रासदी का मूल कारण है।
डॉ.वाईएस परमार बागवानी एवं वानिकी विवि नौणी के पर्यावरण विज्ञान विभाग के प्रमुख डॉ. एसके भारद्वाज के मुताबिक ग्लोबल वार्मिंग के चलते धरती का इकोलॉजी सिस्टम गड़बड़ा रहा है। समय से पूर्व अत्यधिक बारिश उसी का परिणाम है।
उत्तराखंड के हाल और भी भयावह
उत्तराखंड की अलकनंदा, मंदाकिनी, पिंडर, भागीरथी आटागाड़, रामगंगा, सोननंदी, नंदाकिनी आदि नदियां प्रतिवर्ष 3 से 5 मीटर जमीन भूमि का काटकर अपना मार्ग बदल रही हैं।
क्या है हेस्को
हिमालय पर्यावरण अध्ययन एवं सुरक्षा संगठन (हेस्को) 1988 से हिमाचल, जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड सहित हिमालयी राज्यों के पर्यावरण पर अध्ययन कर रहा है। हिमालय के बढ़ते हुए खतरे के बारे में केंद्र एवं प्रदेश सरकारों को समय-समय पर आगाह करता रहता है।