कोई ऐसा शख्स भी नहीं था, जो उन्हें उसके परिवार तक पहुंचा पाए और न ही दूरसंचार के इतने साधन मौजूद थे कि उसका परिवार उनसे संपर्क कर सके। इस हालत में उनके साथी ने ही उनका नया नाम रवि चौधरी रख दिया और इसी नाम के साथ उन्होंने नई जिंदगी की शुरुआत की। इसके बाद रिखी राम मुंबई चले गए। अब तक भी वह इसी नाम से जिंदगी जी रहे थे। इसके बाद फिर नांदेड़ के एक काॅलेज में नौकरी मिलने पर वहीं बस गए। रिखी राम ने बताया कि वर्ष 1994 में उनकी शादी संतोषी से हुई और आज उनके पास दो बेटियां और एक बेटा है।
रिखी राम की जिंदगी फिल्मी पटकथा से कम नहीं। अपनी जवानी में हरियाणा में एक सड़क हादसे में रिखी राम ने अपनी याददाश्त खो दी। मुंबई में जब रिखी राम को दोबारा चोट लगी तो धीरे-धीरे याददाश्त लौटने लगी। करीब 45 साल के बाद अब घर लौटा आए। इस अवधि में उनके माता-पिता भी स्वर्ग सिधार गए, लेकिन जब परिवार में भाई- बहनों ने उसे अपने बीच पाया तो खुशी का ठिकाना नहीं रहा।