रिपोर्ट के अनुसार सड़क के ठीक ऊपर छह मंजिला रिहायशी एवं व्यावसायिक इमारत का निर्माण किया है, जिससे घाटी का प्राकृतिक नजारा बाधित हुआ है। यह मामला नगर एवं ग्राम नियोजन नियमों के उल्लंघन से जुड़ा है। गूगल इमेजरी के अवलोकन से पता चला कि वर्ष 2020 से ही यहां निर्माण कार्य जारी था। इसमें जिस स्थान पर निर्माण किया गया वहां कई देवदार और अन्य प्रजातियों के पेड़ काटे जाने की बात भी सामने आई है। गूगल की पुरानी तस्वीरों में इस क्षेत्र में घनी हरियाली दिखाई देती है, जबकि अब वहां पेड़ों की संख्या कम नजर आती है। रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि मानसून के दौरान पहाड़ियों की कटाई और खोदाई पर रोक होने के बावजूद यहां निर्माण कार्य और सीमेंट से सड़क बनाने का काम जारी रहा। मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने विवादित स्थल पर सभी तरह के निर्माण कार्य तत्काल रोकने के आदेश दिए हैं। मामले की अगली सुनवाई चार नवंबर को होगी।
एफआईआर में नाम दर्ज नहीं एसएचओ को लगाई फटकार
अदालत ने जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव की ओर से सौंपी 30 से अधिक पैराग्राफ वाली विस्तृत रिपोर्ट का अवलोकन किया। रिपोर्ट के तथ्यों के आधार पर अदालत ने संबंधित अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर असंतोष जताया और आरोपियों को बचाने की कोशिश किए जाने पर सवाल उठाए। खंडपीठ ने शिमला के थाना पश्चिम (बालूगंज) के एसएचओ की कार्यप्रणाली पर भी गहरा असंतोष व्यक्त किया। अदालत के अनुसार मामले में 12 अक्तूबर 2026 को भारतीय न्याय संहिता की धारा 326 (बी) और 125 के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई लेकिन उसमें आरोपियों के नाम दर्ज नहीं किए गए। अदालत ने सवाल उठाया कि जब आठ अक्तूबर के आदेश में गीतिका सूद, विवेक सूद, मनीष करोल और डेवलपर मैसर्स तेनजिन कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड के नामों का स्पष्ट उल्लेख किया था तो पुलिस ने इन्हें एफआईआर में शामिल क्यों नहीं किया। एसएचओ ने अदालत में आश्वासन दिया कि एफआईआर में नामजद आरोपियों के नाम शामिल किए जाएंगे। उन्होंने जल्द जांच पूरी कर स्टेटस रिपोर्ट सौंपने की बात भी कही।