अदालत को बताया कि शिक्षक नियमित चयन प्रक्रिया से नियुक्त किए गए हैं और वर्षों से सेवा दे रहे हैं। ऐसे में सीबीएसई स्कूलों में पढ़ाने के लिए अलग से परीक्षा लेना न केवल नियमों के विरुद्ध है बल्कि तार्किक नहीं है। उन्होंने कहा कि राज्य के पास नीति बनाने की शक्ति तो है, लेकिन वह नीति अनुच्छेद 14 की अवहेलना पर आधारित न हो। सरकार एक ही वर्ग के भीतर अलग वर्ग बनाने की कोशिश कर रही है, जो पूरी तरह से असांविधानिक है। कानून के अनुसार, सरकार समान स्थिति वाले कर्मचारियों के बीच भेदभाव नहीं कर सकती। शिक्षकों का कहना है कि पहले से कार्यरत अध्यापकों से परीक्षा लेना अनुचित है और इससे उनकी सेवा शर्तों पर असर पड़ेगा। उन्होंने कहा कि वह स्कूलों के विलय के खिलाफ नहीं है।
लेकिन इस टेस्ट को करवाने से शिक्षक समुदाय के मनोबल पर प्रभाव पड़ेगा। शिक्षक समुदाय सरकार की नीति के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि उन गलत मापदंडों के खिलाफ हैं जो आने वाले वर्षों में विसंगतियां पैदा करेंगे। वहीं राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता अनूप रतन ने दलीलें दी कि प्रदेश में 60 हजार शिक्षक कार्यरत हैं। शिक्षा में गुणवत्ता लाने के लिए प्रदेश सरकार के पास पॉलिसी बनाने का अधिकार है। सरकार के पास सीबीएसई स्कूलों में शिक्षकों की नियुक्ति करने के लिए टेस्ट ही एकमात्र विकल्प है। उन्होंने अदालत को बताया कि दो अध्यापक संघ की यूनियनों ने सरकार के फैसले का समर्थन किया है। सरकार ने सीबीएसई संबद्ध सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के उद्देश्य से शिक्षकों की स्क्रीनिंग टेस्ट के माध्यम से चयन की योजना बनाई है।