सुजानपुर (हमीरपुर)। कोरोना कर्फ्यू के बीच वट सावित्री व्रत पर महिलाओं में खासा उत्साह देखा गया। महिलाएं वट (बरगद) वृक्ष के नीचे पूजा को लेकर अपनी बारी का इंतजार करती नजर आईं। वट सावित्री को वट उपवास भी कहते हैं।
विधि विधान के मुताबिक थाली में पूजा की सामग्री व पकवान लेकर धूप, दीप, डोरी आदि से भगवान गणेश की पूजा के साथ वट पूजा शुरू की। सुहागिन स्त्रियां पति की लंबी आयु, घर में सुख समृद्धि को लेकर वट वृक्ष के नीचे आराधना करती दिखीं। पौराणिक कथा के मुताबिक बरगद का पेड़ त्रिमूर्ति को दर्शाता है, जो भगवान शिव, विष्णु, ब्रह्मा का भी प्रतीक है। मान्यता है कि बरगद के पेड़ के नीचे बैठकर पूजा अर्चना करने से संपूर्ण मनोकामना पूरी होती हैं।
इस व्रत को महिलाएं रीति रिवाज के अनुसार करती हैं। खासकर यह सुहागिन महिलाओं के लिए अति महत्वपूर्ण व्रत है। जिससे सुख समृद्धि और संपूर्ण सौभाग्य प्राप्त होता है। व्रत की महत्ता व महिमा कई धर्म ग्रंथों व पुराणों जैसे सुकंद पुराण, महाभारत आदि में भी मिलती है। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार वृक्ष त्रिमूर्ति को दर्शाता है। इस अवसर पर सौभाग्यवती स्त्रियों ने बरगद के वृक्ष की पूजा की तथा उसके चारों ओर धागा बांधा।
मान्यता है कि इसी दिन सावित्री से यमराज से अपने पति के प्राणों की रक्षा की थी। महिलाओं की ओर से बरगद के पेड़ के नीचे बैठकर सत्यवान और सावित्री की कथा पढ़ी गई तथा व्रत का आयोजन किया गया। महिलाओं की ओर से बरगद के नीचे गणेश, शिव, पार्वती और सत्यवान की मूर्तियां सामने रखी गईं तथा उनकी पूजा की गई। इसके बाद बरगद के पेड़ की परिक्रमा करते हुए कच्चे सूत को 12 बार वृक्ष पर लपेटा गया और हर परिक्रमा पर एक फल वट वृक्ष पर चढ़ाया। राजपुरोहित आशुतोष शर्मा ने कहा कि वट उपवास का महत्व पौराणिक कथाओं में भी है। खासकर सुहागिन स्त्रियों के लिए यह व्रत अति लाभदायक होता है।