सुजानपुर (हमीरपुर)। वर्षा ऋतु की विदाई और शरद ऋतु के आगमन का सूचक सायर पर्व बुधवार को हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा। पर्व की पूर्व संध्या पर बुधवार देर रात तक सेन समाज के लोग घर-घर जाकर सैरी माता की पूजा करवाएंगे।
इसके बाद वीरवार को लोग घरों में विभिन्न प्रकार के पकवान बनाकर पर्व की खुशियां साझा करेंगे। आश्विन मास में मनाए जाने वाले सायर पर्व के साथ ही मौसम में ठंडक का एहसास शुरू हो जाता है। यह पर्व मुख्य रूप से मक्की की फसल की कटाई के बाद मनाया जाता है।
इस अवसर पर लोग नई फसल के साथ मौसमी फल और सब्जियों का पहला अंश सैरी माता को अर्पित कर परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। घरों में बनाए गए पकवान रिश्तेदारों और पड़ोसियों के साथ बांटने की परंपरा है, जिससे आपसी भाईचारा और सामाजिक सौहार्द मजबूत होता है।
सायर पर्व से जुड़ी घर-घर सैरी माता की पूजा करवाने की प्राचीन परंपरा सेन समाज आज भी निभा रहा है। शाम ढलते ही समाज के लोग एक टोकरी में चांदी का सिक्का, मौसमी फल-सब्जियां और सैरी माता की तस्वीर सजाकर घर-घर पहुंचेंगे। वहां विधि-विधान से माता की पूजा करवाई जाएगी। यह सिलसिला देर रात तक चलेगा।
सेन समाज से जुड़े अशोक रतन और तिलक रतन ने बताया कि उनके पूर्वज वर्षों से इस परंपरा को निभाते आ रहे हैं और समाज आज भी इस विरासत को आगे बढ़ा रहा है। उन्होंने कहा कि घर-घर जाकर सैरी माता की पूजा करवाना उनके लिए धार्मिक आस्था के साथ अपनी संस्कृति को जीवित रखने का माध्यम भी है।
वहीं, राजपुरोहित पंडित आशुतोष शर्मा ने बताया कि सायर पर्व का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। यह प्रकृति और नई फसल के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है। इस दिन नई मौसमी फसल, फल और सब्जियों का अंश सैरी माता को अर्पित करने की परंपरा है।
मान्यता है कि इससे घर में अन्न-धन और खुशहाली बनी रहती है।