सुशील शर्मा दियोटसिद्ध (हमीरपुर)। समय परिवर्तन के साथ-साथ बाबा बालक नाथ की तपोस्थली में बनने वाले रोट के स्वरूप में बदलाव आया है। दशकों पहले जहां बाबा बालक नाथ मंदिर में घी में आटे का रोट बनाया जाता था, वहीं अब आटे का स्थान मैदे ने ले लिया है, जबकि घी के स्थान पर रिफाइंड ने अपनी जगह बना ली है।
इसके अलावा गुड़ भी रोट से गायब हो गया है। गुड़ के स्थान पर चीनी का प्रयोग होने लगा है। हालांकि, बाबा बालक नाथ को चढ़ाने के लिए आज भी स्पेशल आटे का रोट तैयार किया जाता है। पुराने समय में श्रद्धालु बाबा बालक नाथ को आटे, घी और गुड़ से बने रोट को घर से बनाकर लाते थे और उसे मंदिर में चढ़ाते थे, लेकिन समय परिवर्तन के साथ-साथ व्यस्तता बढ़ती गई और लोगों ने घरों से रोट लाना बंद कर दिया।
लोगों ने मंदिर के आसपास बनी दुकानों से रोट खरीदना शुरू कर दिया है। आटे से बना रोट देखने में अधिक आकर्षित न होने से इसकी मांग कम होने लगी तो दुकानदारों ने मैदे से रोट का प्रसाद बनाना शुरू कर दिया। यह कम कीमत के साथ-साथ देखने में भी अच्छा लगने लगा तो इसकी मांग बढ़ने लगी।
लोगों की मानें तो पुराने समय में मंदिर पहुंचने वाले श्रद्धालुओं की संख्या कम थी और समय अधिक। श्रद्धालु दो-तीन दिन तक मंदिर में रुकते थे। वर्तमान समय में श्रद्धालुओं की व्यस्तता रहती है। एक ही दिन में लाखों श्रद्धालु पौणाहारी के दरबार में शीश नवाकर घर वापस जाते हैं। वर्तमान में मैदे और तेल में बना एक रोट 20 रुपये में मिलता है, जबकि देसी घी में बने रोट की कीमत 40 रुपये है। संवाद
सुनील कुमार। संवाद
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