रंगस (हमीरपुर)। आयुर्वेद विभाग से सेवानिवृत्त विशेष कार्यकारी अधिकारी (ओएसडी) और केंद्रीय आयुर्वेद परिषद के सदस्य रहे डॉ. अशोक शर्मा ने कहा कि शिशिर ऋतु में ठंड के कारण और बढ़े हुए मधुर और स्निग्ध गुण से शरीर में संचित हुआ विकृत कफ सूर्य के किरणों से पतला होकर आमतौर पर श्वसन मार्ग में तरह-तरह के रोगों को उत्पन्न करता है।
इसलिए इस ऋतु में शुक धन्य में नए चावल, तरकारी में भिंडी, शिबिधान्य में उड़द, मांसवर्ग में मछली, झींगा मछली, कंदमूल में आलू, चुकंदर, सिंघाड़ा आदि फलों में केला, अमरुद, ककड़ी, अखरोट आदि, दूध में दही, मलाई, खोआ, पनीर, आइसक्रीम और लस्सी आदि द्रव्यों का सेवन नहीं करना चाहिए। इसी तरह तिल, तेल और तली चीजों का भी कम सेवन करना चाहिए।
इस ऋतु में पुराने चावल, ज्वार और गेहूं का सेवन लाभप्रद हो सकता है। मेथी, पालक, करेला, बैंगन के अलावा मसूर, मूंग, चना, मटर, कुलथी के अलावा मांस वर्ग में मटन और तंदूरी चिकन आदि, कंदमूल में गाजर, अदरक, लहसुन और मूली आदि लाभदायक हैं। इसी तरह फलों में पपीता और पेठा, दूध में मक्खन कड़ी, अजवाइन, जीरा, हींग, सूखा धनिया, हरा धनिया और काली मिर्च का सेवन करना लाभप्रद रहेगा। ऋतु के अनुसार ही आहार, विहार करने पर व्यक्ति हमेशा के लिए स्वस्थ रह सकता है। उन्होंने कहा कि 16 मार्च से लेकर 15 मई तक वसंत ऋतु का आगाज हो चुका है। इसलिए ऋतु अनुसार ही अपने खान-पान का ख्याल रखें।