हमीरपुर। मृत्यु जीवन का अंत जरूर है, लेकिन मानवता की सेवा का नहीं। हमीरपुर में देहदान और नेत्रदान के प्रति बढ़ती जागरूकता इसकी मिसाल बन रही है।
डॉ. राधाकृष्णन राजकीय मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल हमीरपुर में पिछले डेढ़ वर्ष के दौरान चार लोगों ने चिकित्सा शिक्षा के लिए देहदान किया, जबकि तीन लोगों के नेत्रदान से दृष्टिहीनों के जीवन में रोशनी पहुंची।
मेडिकल कॉलेज में अब तक 77 लोग मृत्यु के बाद देहदान का संकल्प (प्लेज) ले चुके हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, एक व्यक्ति के नेत्रदान से दो दृष्टिहीन लोगों को दृष्टि मिल सकती है, जबकि देहदान मेडिकल विद्यार्थियों को मानव शरीर की संरचना और शल्य चिकित्सा का व्यावहारिक प्रशिक्षण देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
मेडिकल कॉलेज प्रबंधन के अनुसार, जागरूकता अभियानों का सकारात्मक असर दिख रहा है। लोगों से देहदान और नेत्रदान जैसे महादान से जुड़ने की अपील की गई है, ताकि जरूरतमंदों को नई उम्मीद मिले और चिकित्सा शिक्षा को भी मजबूती मिल सके।
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देहदान से तैयार होते हैं बेहतर डॉक्टर
देहदान केवल एक दान नहीं, बल्कि चिकित्सा शिक्षा की सबसे बड़ी प्रयोगशाला है। मेडिकल कॉलेज में दान की गई देह का उपयोग एमबीबीएस और अन्य मेडिकल विद्यार्थियों को मानव शरीर की संरचना समझाने तथा शल्य चिकित्सा का व्यावहारिक प्रशिक्षण देने में किया जाता है। इससे भावी चिकित्सकों का कौशल निखरता है और मरीजों को बेहतर उपचार उपलब्ध कराने में मदद मिलती है।
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लोगों में बढ़ती जागरूकता का प्रमाण है कि अधिक से अधिक लोग देहदान और नेत्रदान के लिए आगे आ रहे हैं। यह महादान न केवल चिकित्सा शिक्षा को मजबूत कर रहा है, बल्कि कई परिवारों के जीवन में नई आशा और रोशनी भी ला रहा है।
-डॉ. देशराज शर्मा, चिकित्सा अधीक्षक, मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल, हमीरपुर