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Himachal : अब गन्ने की नहीं पड़ेगी जरूरत! हिमाचल की शोधार्थी कृतिका शर्मा ने खोजा इथेनॉल बनाने का नया तरीका

Wed, 29 Jul 2026 02:31 PM IST
Ankesh Dogra कमलेश रतन भारद्वाज, हमीरपुर।

सार

मंडी की शोधार्थी कृतिका शर्मा ने ग्रीन केमिकल आधारित ऐसी तकनीक विकसित की है, जिससे फलों, सब्जियों और वन अपशिष्ट से कम पानी में इथेनॉल तैयार किया जा सकता है। इस नवाचार को एनआईटी हमीरपुर के इन्क्यूबेशन सेंटर से चार लाख रुपये की इग्निशन ग्रांट मिली है। तकनीक का लैब परीक्षण सफल हो चुका है और पेटेंट प्रक्रिया जारी है।
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हिमाचल की शोधार्थी ने खोजा इथेनॉल बनाने का नया तरीका - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
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विस्तार
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देश में पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण बढ़ाकर ग्रीन फ्यूल को बढ़ावा दिया जा रहा है, लेकिन इसके लिए गन्ने, मक्का और चावल जैसी फसलों पर बढ़ती निर्भरता और भारी जल खपत बड़ी चुनौती बन रही है। ऐसे समय में हिमाचल प्रदेश के मंडी की शोधार्थी कृतिका शर्मा ने इथेनॉल उत्पादन का ऐसा विकल्प विकसित किया है, जो न केवल गन्ने पर निर्भरता कम करेगा बल्कि फलों, सब्जियों और फॉरेस्ट वेस्ट को भी हरित ईंधन में बदल सकेगा। हिमाचल प्रदेश विवि से पीएचडी कर चुकी कृतिका शर्मा ने ग्रीन केमिकल आधारित तकनीक विकसित की है, जिसके जरिए कृषि एवं वन अपशिष्ट से इथेनॉल तैयार किया जा सकता है। इसमें पारंपरिक तकनीक की तुलना में पानी की खपत काफी कम होती है। 

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यही वजह है कि इस नवाचार को एनआईटी हमीरपुर के इन्क्यूबेशन सेंटर ने चार लाख रुपये की इग्निशन ग्रांट से समर्थन दिया है। इस परियोजना में पालमपुर की एमबीए अंजलि देवी भी सहयोगी के रूप में कार्य कर रही हैं। लैब स्तर पर तैयार इथेनॉल की लागत करीब 60 रुपये प्रति लीटर आई है। अब लक्ष्य इसे व्यावसायिक स्तर पर करीब 40 रुपये प्रति लीटर तक लाना है। परियोजना की एक और खासियत यह है कि इसमें पानी के री-साइक्लिंग के लिए ट्रीटमेंट प्लांट की व्यवस्था भी प्रस्तावित है, जिससे उत्पादन प्रक्रिया और अधिक किफायती और पर्यावरण अनुकूल बन सके। 
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पेटेंट की प्रक्रिया शुरू
कृतिका शर्मा ने बताया कि लैब स्तर पर तकनीक का सफल परीक्षण पूरा हो चुका है। इसके बाद पेटेंट के लिए आवेदन भी कर दिया गया है और सत्यापन प्रक्रिया जारी है। उनका कहना है कि यह तकनीक केवल वाहनों के लिए स्वच्छ ईंधन तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि उद्योगों में हरित ऊर्जा के प्रभावी विकल्प के रूप में भी उपयोगी साबित हो सकती है।

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इथेनॉल को केवल गन्ने या अन्य कृषि फसलों से तैयार करने के बजाय वेस्ट से बनाना अधिक टिकाऊ विकल्प है। इससे वेस्ट टू वेल्थ को बढ़ावा मिलेगा, पर्यावरण संरक्षण होगा और ग्रीन एनर्जी को नई दिशा मिलेगी। -डॉ. पमिता अवस्थी, इंचार्ज, इन्क्यूबेशन सेंटर, एनआईटी हमीरपुर
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