हमीरपुर। आधुनिकता और मशीनी युग के बढ़ते प्रभाव के बीच शहर के चर्म शिल्पकार आज भी अपनी पूर्वजों की विरासत को संजोए हुए हैं। कभी हाथ से बने जूतों और चप्पलों की अच्छी खासी मांग रहती थी, लेकिन रेडीमेड और ब्रांडेड फुटवियर के बढ़ते चलन ने इस पारंपरिक व्यवसाय को काफी प्रभावित किया है।
इसके बावजूद शहर में करीब पांच परिवार आज भी जूतों की मरम्मत और चर्म शिल्प के कार्य से अपनी आजीविका चला रहे हैं। शिल्पकारों का कहना है कि पहले लोग लंबे समय तक एक ही जोड़ी जूते का उपयोग करते थे और खराब होने पर उसकी मरम्मत करवाते थे, जिससे उन्हें नियमित काम मिलता था।
अब कम कीमत में नए जूते उपलब्ध होने के कारण लोग मरम्मत की बजाय नया फुटवियर खरीदना अधिक पसंद करते हैं।
शहर के विभिन्न स्थानों पर ये शिल्पकार सुबह से शाम तक जूतों की सिलाई, सोल बदलने, पॉलिश करने और अन्य मरम्मत कार्यों में जुटे रहते हैं। उनका कहना है कि यह केवल रोजगार नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही कला और पहचान भी है।
नई पीढ़ी का इस व्यवसाय की ओर रुझान कम होने से उन्हें चिंता है कि कहीं यह पारंपरिक शिल्प भविष्य में विलुप्त न हो जाए। शिल्पकारों का मानना है कि यदि सरकार और समाज इस कला को प्रोत्साहन दे, तो न केवल उनकी आर्थिक स्थिति सुधर सकती है, बल्कि प्रदेश की लोक शिल्प परंपराएं भी संरक्षित रह सकती हैं।
अब समय परिवर्तन के साथ मरम्मत कम होने से कारोबार पर असर पड़ा है। लोग मरम्मत कम करवाते हैं। नौकरी करने के स्थान पर अपने पूवर्जों की कला को आगे बढ़ाना जरूरी है।
-विशाल कुमार, निवासी वार्ड नंबर नौ, हमीरपुर
पहले बुजुर्ग या ग्रामीण लोग हाथ से बने जूतों को पहनना पसंद करते थे। अब मांग बदल गई है। मशीनी युग के कारण लोग कपड़े से बने हुए जूते अधिक पसंद करते हैं। इससे कारोबार पर प्रभाव पड़ा है।
-बृजलाल, निवासी हमीरपुर
हमीरपुर में मेडिकल कॉलेज के नजदीक लोगों के जूतों की मरम्मत करते हुए चर्मशिल्पकार। संवाद
हमीरपुर में मेडिकल कॉलेज के नजदीक लोगों के जूतों की मरम्मत करते हुए चर्मशिल्पकार। संवाद