चीड़ की पत्तियों से उत्पाद बनाते हुए कविता । संवाद
हमीरपुर। शादियों में रंग बिरंगी डिजाइनदार टोकरियों को देख कर मन में सीखने की ललक उठी और शौक के तौर पर चीड़ की पत्तियों को आकार देकर उत्पाद बनाना सीखा। सोचा न था कि यही शौक आर्थिकी को चार चांद लगा देगा। आज हर महीने 15 से 20 रुपये की आमदन हो जाती है। पहले घर पर अकेलापन महसूस होता था। अब स्वयं सफलता की इबारत लिख रही हूं बल्कि साथ ही अन्य महिलाओं को भी अपने पैरों पर खड़े होने का हुनर सीखा रही हूं। यह कहना है लठियानी की कविता का, जो चीड़ की पत्तियों से विभिन्न डिजाइन बनाकर अपनी आर्थिकी को सुदृढ़ कर रही हैं।
कविता ने 2012 में मायके व ससुराल में ग्रामीण बुजुर्ग महिलाओं से हुनर सीखना शुरू किया तो उन्हें तंज भी सहने पड़े लेकिन उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। आज वह चीड़ की पत्तियों से रोटी बॉक्स, टी कॉस्टर, फ्रूट बकेट, टैंपल टोकरी, टोकरी, गुड़िया, की चेन, टॉप्स चूड़ियां, गले का हार बनाकर अच्छी आय कमा रही हैं। कविता का कहना है कि जंगल से चीड़ की पत्तियां लाते हैं और प्रोसेस पूरा करके उत्पाद तैयार करते हैं। एक आइटम को बनाने में चार से लेकर 30 दिन तक समय लगता है। मूल्य भी उसके अनुसार ही तय होता है। ऑनलाइन भी बेच रहे हैं तथा स्थानीय स्तर पर भी बेच रहे हैं। शादियों में विभिन्न डिजाइन की टोकरियों को देख कर कला को सीखने की ललक हुई और अपने मायके और ससुराल में स्थानीय बुजुर्ग महिलाओं से कला को सीखा और इसके बाद प्रैक्टिस से हुनर आया और नए नए डिजाइन बनाना सीखा। कविता के अनुसार छोटी आइटम की 200 रुपये से लेकर 2000 रुपये तक कीमत होती है। महिला होकर घर से बाहर निकलना काफी मुश्किल होता है लेकिन परिजनों का साथ उनकी हिम्मत बनी। आज वह अन्य महिलाओं को भी इसका प्रशिक्षण दे रही हैं।