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Hamirpur (Himachal) News: किसान रबी सीजन में बीजें आलू और दालें

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हमीरपुर। वायुमंडल में ग्रीन हाउस गैसों के प्रभाव के कारण जलवायु में निरंतर परिवर्तन आ रहा है। इसका असर कृषि पर भी पड़ता जा रहा है। हाल ही में जलवायु परिवर्तन के कारण कृषि पर पड़ रहे प्रभावाें पर शिमला में एक बैठक प्रदेश कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन अभिकरण ने आयोजित की और इसमें फसलों पर पड़ रहे इसके बुरे प्रभाव पर मंथन भी किया। जिला हमीरपुर कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन अभिकरण के कृषि विशेषज्ञ राजेश शर्मा ने इस बैठक में भाग लिया। उन्हाेंने बैठक में जलवायु परिवर्तन के कारण कृषि क्षेत्र में भी फसलों के बदलाव पर अपने विचार प्रकट किए। इसकी सभी जिलों से आए कृषि विशेषज्ञों ने सराहना की। उन्होंने किसानों को जलवायु परिवर्तन के कारण फसलों में भी बदलाव करने की सलाह दी है। किसान गंदम की बिजाई के बजाय आलू और दालों की फसलों को बीजकर जलवायु पर पड़ रहे सूखे के प्रभाव से हाेने वाले नुकसान से बच सकते हैं। किसानों ने इस रबी सीजन में गेहूं की फसल बीज रखी है। इससे किसानों को काफी नुकसान हो रहा है और खेताें में सारी फसलें सूख गई हैं। किसानों को खेतों में आर्गेनिक कार्बन की मात्रा बढ़ानी होगी, ताकि अगर बारिश नहीं भी होती तो भी खेतों में नमी बरकरार रहे। किसानों को गेहूं के बजाय आलू और उसके बाद अरबी जैसी फसलों को खेतों में बीजना चाहिए। जहां जंगली जानवरों से फसलों को नुकसान पहुंचने का भय रहता था, वहीं जलवायु में आ रहे परिवर्तन से किसानों को पशुचारे की भी समस्या पैदा हो गई है। किसान बागवानी के साथ-साथ दोहरी फसलें खेतों में उगाकर लाभ प्राप्त कर सकते हैं। ऐसा करने से उनके पशुधन के लिए चारे की समस्या भी नहीं रहेगी। बरसात के दौरान बाढ़ जैसी स्थिति बन जा रही है, वहीं रबी सीजन के दौरान सूखे जैसी स्थिति बनी हुई है। किसानों के लिए फसलों में बदलाव करना ही सबसे बेहतर विकल्प है। उन्हें जल्द प्राप्त होने वाली फसलों को अपने खेतों में बीजना चाहिए ताकि किसानों को कोई नुकसान न हो। उन्होंने किसानों को गोबर और केंचुआ खाद तैयार करके खेतों में डालने की सलाह दी है।बाक्स
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कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन अभिकरण परियोजना निदेशक (आत्मा) नीति सोनी ने बताया कि जलवायु में परिवर्तन लगातार देखा जा रहा है। जहां बरसात में भारी बारिश से आपदा जैसी स्थिति बनी थी। वहीं रबी सीजन में बारिश न होने से गेहूं की फसल सूखने के कगार पर पहुंच गई है। किसान इस भारी नुकसान से बचने के लिए अपनी फसलों में बदलाव करें।
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