आदर्शनगर के किसान रविंद्र मशरूम की खेती करते हुए।
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रंगस (हमीरपुर)। मन में कुछ करने का जज्बा हो तो मुकाम मिल ही जाता है। उपमंडल नादौन की ग्राम पंचायत कंडरोला के आदर्श नगर निवासी रविंद्र कुमार (40) ने कुछ ऐसा ही कर दिखाया है और युवाओं को स्वावलंबी बनने की राह दिखाई है। रविंद्र कुमार खेतीबाड़ी में मेहनत कर बटन मशरूम उगा प्रतिमाह डेढ़ से दो लाख रुपये कमा रहे हैं। इसके साथ ही उन्होंने दस लोगों को प्रत्यक्ष रूप और 300 लोगों को अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार दिलाकर मिसाल पेश की है।
रविंद्र ने वर्ष 2004 में उद्यान विभाग से अनुदान लेकर मशरूम उगाने का प्रोजेक्ट शुरू किया। युवा किसान ने बताया कि 2004 से पहले उनके पिता रतन चंद ने मशरूम उगाने का काम वर्ष 2000 में पालमपुर स्थित एक निजी कंपनी से प्रशिक्षण लेकर शुरू किया था। लेकिन, उस समय मशरूम इतना नहीं बिकता था। न ही लोगों को मशरूम में पाए जाने वाले पोषक तत्वों के बारे में पता था। उस दौरान उनके पिता को इसमें ज्यादा कामयाबी हासिल नहीं हो पाई। जबकि, रविंद्र उस समय एक निजी कंपनी में नौकरी करता था।
पिता के मनोबल को टूटता देख रविंद्र ने निजी नौकरी छोड़कर पिता के साथ हाथ बंटाने की सोची और वर्ष 2004 से पिता से सीखकर मशरूम उगाना शुरू किया। इसे स्वरोजगार के रूप में अपनाकर पिता की ओर से संजोए गए सपने को पूरा करने का मन में संकल्प किया। वर्तमान में रविंद्र प्रतिदिन डेढ़ से दो क्विंटल मशरूम हमीरपुर, सुजानपुर, नादौन, ज्वालाजी और देहरा को सप्लाई करता है। मशरूम को थोक के भाव में बेचकर प्रतिमाह डेढ़ से दो लाख रुपये मुनाफा कमाता है। यही नहीं उत्तम किस्म के मशरूम कंपोस्ट के बैग तैयार करके कृषि विज्ञान केंद्र बड़ा, जायका प्रोजेक्ट हमीरपुर आदि को भी उपलब्ध करवाता है।
इससे सर्दियों के सीजन में करीब 20 लाख रुपये कमा लेता है। रविंद्र ने कहा कि उसने जिला हमीरपुर के 300 के करीब छोटे किसानों को भी अपने प्रोजेक्ट पर प्रशिक्षण देकर और उनको मशरूम कंपोस्ट के बैग उपलब्ध करवाकर रोजगार के साधन उपलब्ध करवाए हैं। इससे अधिकतर किसान आत्मनिर्भर भी बने हैं। यही नहीं उनके प्रोजेक्ट में भी वर्तमान समय में 10 बेरोजगार युवकों को रोजगार के साधन उपलब्ध करवाए गए हैं। इसके लिए डॉ. वाईएस परमार यूनिवर्सिटी सोलन तथा चौधरी सरवन कुमार एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी से वर्ष 2021 में उन्हें सम्मान मिल चुका है। उन्होंने बेरोजगार युवकों से आग्रह किया है है कि इतने पद सरकारी नौकरियों के नहीं निकलते हैं, जितने पढ़े लिखे युवा बेरोजगार घूम रहे हैं। युवा कृषि को स्वरोजगार के रूप में अपनाकर अपनी आर्थिकी सुदृढ़ कर सकते हैं।