अदालत ने जब सरकारी रिकॉर्ड मंगवाकर जांच की, तो पाया कि कर्मचारी को न तो कोई चार्जशीट दी गई और न ही उसे अपनी बात रखने का कोई उचित अवसर मिला। कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि बिना किसी अनुशासनात्मक जांच के किसी कर्मचारी को बर्खास्त करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का घोर उल्लंघन है। अदालत ने 19 अप्रैल 2025 और 31 मई 2025 के दोनों सरकारी आदेशों को रद्द करते हुए याचिकाकर्ता को तुरंत उनके पुराने पद पर बहाल करने का आदेश दिया। हालांकि, कोर्ट ने सरकार को यह छूट दी है कि यदि वह चाहे, तो कानून के दायरे में रहकर और उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए याचिकाकर्ता के खिलाफ नए सिरे से अनुशासनात्मक जांच शुरू कर सकती है।
याचिकाकर्ता को साल 2012 में एक प्रोजेक्ट के तहत अनुबंध पर प्रोग्रामर नियुक्त किया गया था। साल 2020 में विभागीय स्क्रीनिंग कमेटी की सिफारिशों पर उनकी सेवाओं को नियमित कर दिया गया। कुछ समय बाद एक शिकायत के आधार पर ग्रामीण विकास विभाग के सचिव ने फरवरी 2025 में आदेश जारी किया। इसमें निष्कर्ष निकाला गया कि याचिकाकर्ता की शुरुआती नियुक्ति और बाद में कोर फैकल्टी के रूप में किया गया नियमितीकरण भर्ती एवं पदोन्नति नियमों के खिलाफ था, क्योंकि वह जरूरी योग्यताएं पूरी नहीं करते थे। इसी आधार पर अप्रैल और मई 2025 में अधिसूचना जारी कर उनकी सेवाओं को अवैध घोषित कर टर्मिनेट कर दिया गया था।
प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ केवल एफआईआर दर्ज होने या अदालत में चालान पेश कर देने मात्र से उसकी पदोन्नति को सीलबंद लिफाफा प्रक्रिया के तहत रोका नहीं जा सकता। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल ने कहा कि जब डीपीसी की बैठक हुई या जब प्रमोशन ऑर्डर जारी हुए, तब याचिकाकर्ता न तो निलंबित था और न ही उसके खिलाफ कोई विभागीय जांच या कोर्ट में आरोप तय हुए थे। ऐसे में विभाग की ओर से सीलबंद लिफाफा प्रक्रिया अपनाना पूरी तरह से गलत और गैरकानूनी था। सीलबंद लिफाफा प्रक्रिया केवल तीन स्थितियों में लागू होती है। मसलन कर्मचारी निलंबित हो, विभागीय जांच में चार्जशीट जारी हो चुकी हो या फिर आपराधिक अदालत में आरोप तय हो चुके हों।अदालत ने सरकार और वन विभाग को आदेश दिया है कि याचिकाकर्ता से जुड़ा डीपीसी का सीलबंद लिफाफा तुरंत खोला जाए।
यदि पदोन्नति समिति ने उन्हें योग्य पाया है, तो उन्हें उनके साथी कर्मचारियों की पदोन्नति की तारीख (सितंबर 2025) से ही डिप्टी रेंजर के पद पर प्रमोट किया जाए। इसके साथ ही याचिकाकर्ता को पुरानी तारीख से ही पदोन्नति के साथ-साथ पूरी वरिष्ठता और वेतन के एरियर (बकाया) सहित सभी परिणामी लाभ प्रदान किए जाएं। याचिकाकर्ता को 17 अक्तूबर 2007 को वन विभाग में फॉरेस्ट गार्ड (वन रक्षक) के पद पर नियुक्त किया गया था। सितंबर 2023 में एक आपराधिक मामले में उन्हें भी आरोपी बनाया गया, जिसके बाद उन्हें निलंबित कर दिया गया था। हालांकि, जुलाई 2024 में उन्हें सेवा में बहाल कर दिया गया। सितंबर 2025 में विभागीय पदोन्नति समिति की सिफारिशों पर याचिकाकर्ता के साथ नियुक्त हुए अन्य फॉरेस्ट गार्ड्स को डिप्टी रेंजर के पद पर प्रमोट कर दिया गया, लेकिन याचिकाकर्ता के खिलाफ एफआईआर लंबित होने के कारण उनका परिणाम सीलबंद लिफाफे में रख दिया गया। पुलिस ने चालान तो पेश कर दिया था, लेकिन याचिकाकर्ता के खिलाफ आरोप तय नहीं हुए थे। इसके खिलाफ उन्होंने हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की।