इस बीच कृष्ण बलदेव ने पुनर्विचार याचिका दायर की, इसके बाद डीसी कुल्लू ने अपने पुराने आदेश को बदलते हुए सीधे तौर पर उन्हें वंशानुगत आधार पर कारदार नियुक्त करने का फैसला सुना दिया और बैठक रद्द कर दी। हाईकोर्ट ने कहा कि मंदिर के पारंपरिक दस्तावेज के अनुसार यदि किसी कारदार को अविश्वास या गड़बड़ी के कारण पद से हटाया गया हो, तो उसके कानूनी वारिस सीधे तौर पर वंशानुगत अधिकार का दावा नहीं कर सकते। ऐसी स्थिति में बहुमत की राय और आम सहमति लेना जरूरी है। अदालत ने यह भी पाया कि डीसी ने इस समीक्षा आदेश को पारित करने के लिए न तो सभी पक्षों (जैसे मंदिर समिति के प्रधान) को सुनवाई का मौका दिया और न ही उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन किया। हाईकोर्ट ने डीसी कुल्लू को आदेश दिया है कि वह चार सप्ताह के भीतर हारियानों की बैठक बुलाने की प्रक्रिया को पूरा करें।