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Himachal: कर्मचारी के पेंशन और सेवानिवृत्ति लाभों में जुड़ेगी अनुबंध अवधि, जानें हाईकोर्ट के बड़े निर्णय

Fri, 08 May 2026 05:00 AM IST
Krishan Singh संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।

सार

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सरकारी कर्मचारी (भर्ती एवं सेवा शर्तें) अधिनियम 2024 के माध्यम से कर्मचारियों के लाभों को रोकना या उनकी सेवाओं की शर्तों में नकारात्मक बदलाव करना कानूनन गलत है।
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सरकारी कर्मचारी (भर्ती एवं सेवा शर्तें) अधिनियम 2024 के माध्यम से कर्मचारियों के लाभों को रोकना या उनकी सेवाओं की शर्तों में नकारात्मक बदलाव करना कानूनन गलत है। अदालत ने देविंद्र कुमार बनाम हिमाचल राज्य मामले में इस अधिनियम को असांविधानिक करार देते हुए इसे रद्द कर दिया है। उक्त अधिनियम के आधार पर राज्य सरकार की ओर से जारी किए गए सभी आदेश, निर्देश और रिकवरी नोटिस तत्काल प्रभाव से निरस्त किए गए हैं। न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ ने अनुबंध के आधार पर नियुक्त कर्मचारियों के लिए चार महत्वपूर्ण सिद्धांत निर्धारित किए हैं। कर्मचारी जो अनुबंध पर नियुक्त हुए थे और बाद में नियमित हुए, उनकी अनुबंध अवधि को पेंशन और सेवानिवृत्ति लाभों के लिए जोड़ा जाएगा।

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अगले तीन महीनों के भीतर सभी लाभ सुनिश्चित किए जाएं
दूसरा, अनुबंध सेवा के दौरान की वार्षिक वेतन वृद्धि को केवल सेवानिवृत्ति लाभों और अंतिम वेतन के निर्धारण के लिए नोशनल (काल्पनिक) आधार पर जोड़ा जाएगा, हालांकि इस अवधि का एरियर (बकाया) नहीं मिलेगा। तीसरा, यदि किसी कर्मचारी की अनुबंध नियुक्ति आरएंडपी नियमों के तहत या बैचवाइज आधार पर हुई है, तो वे अपनी पहली नियुक्ति की तारीख से ही वरिष्ठता और सभी वित्तीय लाभों के हकदार होंगे। अंतिम, पेंशन जैसे आवर्ती लाभों के मामलों में, यदि याचिका दायर करने में देरी हुई है, तो वित्तीय लाभों को दावा करने से 3 साल पहले तक सीमित किया जा सकता है। अदालत ने दलीप सिंह (याचिकाकर्ता) को 30 मई 2026 तक सक्षम प्राधिकारी के समक्ष अपना प्रतिनिधित्व प्रस्तुत करने की अनुमति दी है। सरकार को आदेश दिया गया है कि वह 30 जून 2026 तक कर्मचारी की बात सुनकर एक सकारण आदेश पारित करे। साथ ही, अदालत ने स्पष्ट किया कि जिन कर्मचारियों के पक्ष में पहले ही अदालती फैसले आ चुके हैं, उन्हें अगले तीन महीनों के भीतर सभी लाभ सुनिश्चित किए जाएं।

सहायक अभियंता की पदोन्नति प्रक्रिया पर रोक
प्रदेश हाईकोर्ट ने सहायक अभियंता के पदों पर 29 फीसदी कोटे के तहत पदोन्नति के लिए विचार किए जा रहे जूनियर कर्मचारी की पदोन्नति को लेकर राज्य सरकार की ओर से किए गए नए संशोधन पर फिलहाल रोक लगा दी है। न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि 11 फरवरी 2026 को 29 फीसदी संशोधित कोटे को लेकर जारी अधिसूचना के क्रियान्वयन पर अगली सुनवाई तक फिलहाल रोक रहेगी। अदालत ने राज्य सरकार को नोटिस जारी कर चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने के आदेश दिए हैं। याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि 29 फीसदी कोटे के तहत पदोन्नति के लिए विचार किए जा रहे जूनियर कर्मचारी इस मामले में आवश्यक पक्षकार हैं। अदालत ने इस दलील को स्वीकार करते हुए 22 अन्य कर्मचारियों को मामले में शामिल करने की अनुमति दे दी है। अदालत ने यह आदेश अमन परमार और अन्य की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिए हैं। हालांकि, अदालत ने सरकार को राहत देते हुए यह भी कहा है कि यदि सरकार चाहे तो पुराने नियमों (संशोधन से पहले की व्यवस्था) के आधार पर पदोन्नति की प्रक्रिया जारी रख सकती है।मामले की अगली सुनवाई 15 जून को होगी।याचिकाकर्ताओं ने राज्य सरकार द्वारा पदोन्नति नियमों में किए गए ने संशोधन को चुनौती दी है, जिसमें उनके अनुसार जूनियर कर्मचारियों को अनुचित लाभ मिलने की संभावना है।

बिना अनुमति याचिका वापस ली तो दोबारा सुनवाई नहीं : हाईकोर्ट
 प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई याचिकाकर्ता अपनी याचिका को बिना दोबारा मामला दायर करने की अनुमति लिए वापस ले लेता है, तो वह उसी मुद्दे पर फिर से नई याचिका दायर नहीं कर सकता। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की अदालत ने कुलदीप कुमार बनाम अन्य मामले की सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया है। याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में वर्ष 2023 में एक याचिका दायर कर मांग की थी कि उन्हें एक जनवरी 2008 से नियमितीकरण का लाभ दिया जाए। इसके साथ ही उन्होंने विभाग के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की वरिष्ठता सूची को फिर से तैयार करने और उन्हें क्लर्क के पद पर पदोन्नति देने की गुहार लगाई। सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह तथ्य आया कि याचिकाकर्ताओं ने पहले भी इसी मांग के साथ एक याचिका वर्ष 2022 में दायर की थी। उस समय उन्होंने खंडपीठ के सामने अपनी याचिका वापस ले ली थी, लेकिन कोर्ट से यह अनुमति नहीं मांगी थी कि वे भविष्य में फिर से नया मामला दायर करेंगे। अदालत ने इस मामले को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट के मामले का जिक्र किया। कोर्ट ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति बिना अनुमति के याचिका वापस लेता है, तो यह माना जाएगा कि उसने उस उपचार के अपने अधिकार को खत्म कर दिया है। अदालत ने टिप्पणी की कि इस नियम का उद्देश्य बेंच हंटिंग (अपनी पसंद की पीठ चुनने की कोशिश) की प्रवृत्ति को रोकना है। याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई थी कि पिछला मामला इसलिए वापस लिया गया कि नियोक्ता ने आश्वासन दिया था कि उनकी शिकायतों का समाधान किया जाएगा। हालांकि, अदालत ने इस दलील को यह कहते हुए ठुकरा दिया कि पहले के आदेश में ऐसी किसी बात का जिक्र नहीं था।

पिता पर अतिक्रमण के चलते नामांकन रद्द को हाईकोर्ट में चुनौती
प्रदेश हाईकोर्ट में नगर निगम सोलन के वार्ड नंबर 3 से भाजपा उम्मीदवार पीयूष का नामांकन रद्द होने के मामले में सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि उम्मीदवार के पिता पर सरकारी जमीन पर अतिक्रमण के आरोप लगाए गए हैं।  इसके चलते एसडीएम सोलन ने उक्त उम्मीदवार का नामांकन रद्द कर दिया है। उन्होंने अदालत को बताया कि एसडीएम की कार्रवाई नगर निगम अधिनियम के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि उम्मीदवार का नामांकन बिना तथ्य और जांच के इस आधार पर रद्द करना कानूनी गलत है। इस मामले की सुनवाई न्यायाधीश ज्योत्सना रिवाल दुआ की अदालत कर रही है। अदालत ने मामले में सुनवाई करते हुए राज्य सरकार सहित चुनाव आयोग के सचिव नोटिस जारी करते हुए अपना पक्ष रखने को कहा है। मामले में शुक्रवार को भी सुनवाई होगी।
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एनएचएआई ने उत्सव बैंस को हिमाचल हाईकोर्ट का स्टैंडिंग काउंसिल बनाया
 नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एनएचएआई) ने एडवोकेट उत्सव बैंस को हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट में स्टैंडिंग काउंसिल नियुक्त किया है। वर्तमान में बैंस एनएचएआई, एनसीबी, होम मिनिस्ट्री, डीएसआईडीसी (दिल्ली सरकार) और समेत भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों में सीनियर स्टैंडिंग काउंसिल के रूप में सेवाएं दे रहे हैं। उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि भी कानून से जुड़ी रही है। उनके दादा पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में जज रह चुके हैं, जबकि उनके पिता सीनियर एडवोकेट हैं। उनकी मां मूल रूप से हिमाचल प्रदेश की रहने वाली हैं। उत्सव बैंस ने कानून की पढ़ाई पंजाब यूनिवर्सिटी और हार्वर्ड लॉ स्कूल से की है। वे देश के कई अहम आतंकी मामलों में पैरवी कर चुके हैं। इनमें पुलवामा आतंकी हमला, 26/11 मुंबई अटैक, 1993 मुंबई ब्लास्ट और कश्मीर में कश्मीरी पंडितों की हत्या से जुड़े केस शामिल हैं। 
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